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देवउठनी एकादशी 2022 और तुलसी विवाह: तिथि, महत्व, कथा और पूजा विधि

Festivals Vivek Hardaha Updated: नवम्बर 3, 2026

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हिंदू धर्म में देवउठनी एकादशी का दिन अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वह पावन तिथि है जब सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु अपनी चार माह की योगनिद्रा से जागते हैं, और इसी के साथ सभी मांगलिक कार्य, जो चातुर्मास में वर्जित थे, पुनः प्रारंभ हो जाते हैं। इस शुभ दिन पर भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप और माता तुलसी का विवाह भी संपन्न कराया जाता है, जिसे तुलसी विवाह के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2022 में यह दिव्य पर्व कब मनाया गया, इसका क्या महत्व है, इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं क्या हैं और इसकी पूजा विधि क्या है, आइए विस्तार से जानते हैं।

देवउठनी एकादशी क्या है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इसे ‘देवोत्थान एकादशी’, ‘प्रबोधिनी एकादशी’ और ‘देवउठनी ग्यारस’ जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। यह एकादशी चातुर्मास की समाप्ति का प्रतीक है, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलता है। मान्यता है कि इन चार महीनों में भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते हैं और देवउठनी एकादशी के दिन अपनी निद्रा से जागृत होते हैं।

देवउठनी एकादशी 2022 की तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2022 में देवउठनी एकादशी का पर्व 04 नवंबर को मनाया गया था। एकादशी तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय इस प्रकार था:

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 03 नवंबर 2022, शाम 07 बजकर 30 मिनट पर
  • एकादशी तिथि समाप्त: 04 नवंबर 2022, शाम 06 बजकर 08 मिनट पर
  • देवउठनी एकादशी व्रत का पारण मुहूर्त: 05 नवंबर 2022, सुबह 06 बजकर 39 मिनट से सुबह 08 बजकर 52 मिनट तक

यह तिथि भगवान विष्णु के भक्तों के लिए विशेष फलदायी होती है, जब वे व्रत रखकर और पूजा-अर्चना करके प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

देवउठनी एकादशी का महत्व

देवउठनी एकादशी का महत्व कई कारणों से है:

  • मांगलिक कार्यों का आरंभ: चातुर्मास के दौरान सभी शुभ कार्य, विशेषकर विवाह, वर्जित होते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागने के साथ ही मांगलिक कार्यों का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता है।
  • पापों का नाश: इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • सुख-समृद्धि: मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों के घर में सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।
  • आध्यात्मिक जागृति: यह दिन आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है, जब भक्त अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करके धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

देवउठनी एकादशी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु ने शंखासुर नामक एक भयंकर राक्षस का वध किया था। इस युद्ध में भगवान बहुत थक गए थे, जिसके बाद वे क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर चार मास के लिए योगनिद्रा में चले गए। यह अवधि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चली। जब भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जागे, तो सभी देवी-देवताओं ने उनकी स्तुति की और इस दिन को ‘देवउठनी एकादशी’ के रूप में मनाया गया। इस दिन से सृष्टि के संचालन का कार्यभार पुनः भगवान विष्णु संभाल लेते हैं।

तुलसी विवाह: एक पवित्र परंपरा

देवउठनी एकादशी के दिन ही तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जो भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप और माता तुलसी के विवाह का प्रतीक है। यह विवाह एक सामान्य हिंदू विवाह की तरह ही विधि-विधान से संपन्न होता है। यह परंपरा भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन्हें कन्यादान का पुण्य मिलता है और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

तुलसी विवाह 2022 की तिथि और मुहूर्त

तुलसी विवाह आमतौर पर देवउठनी एकादशी के दिन या उसके अगले दिन मनाया जाता है। वर्ष 2022 में, तुलसी विवाह भी 04 नवंबर 2022 को ही देवउठनी एकादशी के साथ मनाया गया था। कई स्थानों पर एकादशी के अगले दिन यानी 05 नवंबर को भी तुलसी विवाह की रस्में पूरी की गई थीं। इसके लिए कोई विशेष अलग से मुहूर्त नहीं होता, बल्कि देवउठनी एकादशी का ही शुभ समय तुलसी विवाह के लिए भी प्रयोग किया जाता है।

तुलसी विवाह की कथा

तुलसी विवाह के पीछे एक मार्मिक पौराणिक कथा है। पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था, जो जालंधर नामक एक अत्यंत पराक्रमी और अहंकारी राक्षस की पत्नी थी। वृंदा एक परम पतिव्रता स्त्री थी, जिसके सतीत्व के कारण जालंधर को कोई भी देव पराजित नहीं कर सकता था। देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। भगवान विष्णु ने छल से जालंधर का रूप धारण कर वृंदा के सतीत्व को भंग कर दिया, जिससे जालंधर की शक्ति क्षीण हो गई और शिवजी ने उसका वध कर दिया।

जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो वह अत्यंत क्रोधित हुई और भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया। भगवान विष्णु ने वृंदा के श्राप को स्वीकार किया और शालिग्राम के रूप में परिवर्तित हो गए। वृंदा ने अपने प्राण त्याग दिए और जिस स्थान पर उसने देह त्यागी, वहां तुलसी का पौधा उग आया। भगवान विष्णु ने वृंदा के त्याग और सतीत्व से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि बिना तुलसी के उनका भोग अधूरा रहेगा और वे शालिग्राम के रूप में तुलसी से विवाह करेंगे। तभी से हर वर्ष देवउठनी एकादशी के दिन शालिग्राम और तुलसी का विवाह संपन्न कराया जाता है।

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह की पूजा विधि

इस पावन पर्व पर पूजा-अर्चना निम्नलिखित विधि से की जाती है:

  1. प्रातः स्नान: एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. संकल्प: व्रत और पूजा का संकल्प लें।
  3. तुलसी मंडप सजाएं: घर के आंगन या बालकनी में तुलसी के पौधे के पास एक सुंदर मंडप बनाएं। इसे गन्ने, फूलों, रंगोली और दीयों से सजाएं।
  4. भगवान विष्णु की स्थापना: मंडप के नीचे या पास में भगवान विष्णु (शालिग्राम स्वरूप) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  5. पूजन सामग्री: पूजा के लिए धूप, दीप, रोली, चंदन, अक्षत, पुष्प, फल (विशेषकर गन्ना, सिंघाड़ा, बेर), मिठाई, मूली, आंवला और तुलसी दल एकत्रित करें।
  6. विवाह की रस्में: जिस प्रकार एक सामान्य विवाह में हल्दी, मेहंदी, सिंदूर आदि की रस्में होती हैं, उसी प्रकार तुलसी और शालिग्राम को भी ये चीजें अर्पित की जाती हैं। तुलसी को लाल चुनरी ओढ़ाई जाती है और शालिग्राम को पीतांबर पहनाया जाता है।
  7. आरती और मंत्र जाप: भगवान विष्णु और तुलसी माता की आरती करें। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें। तुलसी माता के मंत्रों का भी जाप कर सकते हैं।
  8. कथा श्रवण: देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह की कथा सुनें या पढ़ें।
  9. भोग: भगवान विष्णु और तुलसी माता को सात्विक भोग लगाएं।
  10. प्रदक्षिणा: तुलसी के पौधे की परिक्रमा करें और अपनी मनोकामनाएं मांगें।
  11. शाम की पूजा: शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएं और भगवान विष्णु का स्मरण करें।
  12. पारण: एकादशी के अगले दिन (द्वादशी को) शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें।

इस दिन क्या करें और क्या न करें

क्या करें:

  • भगवान विष्णु और माता तुलसी की सच्चे मन से आराधना करें।
  • एकादशी का व्रत रखें (यदि संभव हो)।
  • दान-पुण्य करें।
  • ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करें।
  • तुलसी के पौधे की देखभाल करें और जल चढ़ाएं।

क्या न करें:

  • इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें (विवाह के लिए पहले से तोड़कर रख सकते हैं)।
  • तामसिक भोजन का सेवन न करें।
  • किसी का अनादर न करें और कटु वचन न बोलें।
  • बाल न कटवाएं और नाखून न काटें।

निष्कर्ष

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह का पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह हमें प्रकृति, भक्ति और समर्पण का संदेश भी देता है। भगवान विष्णु की निद्रा से जागृति और तुलसी-शालिग्राम के विवाह का यह पावन प्रसंग हमें जीवन में शुभता, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है। 2022 में मनाए गए इस पर्व की स्मृतियां और इसका महत्व हर साल भक्तों को एक नई ऊर्जा और उत्साह प्रदान करता है। इस दिन की गई पूजा-अर्चना से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

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