जून 2026 में अखबारों और कोर्ट की फाइलों में एक लाइन बार-बार आई: “टेलीग्राम नया डार्क वेब बन गया है।” फोन पर नीला पेपर-प्लेन वाला ऐप रोज चैट, चैनल, न्यूज और फैमिली ग्रुप के लिए खुलता है। फिर अचानक वही ऐप डark वेब जैसा लगने लगता है। सवाल सीधा है — ये डर कितना टेक्निकल सच है, और कितना सरकारी रूपक?
यह लेख न तो ऐप बंद करने का भाषण है, न छिपे नेटवर्क तक पहुँचने की गाइड। मकसद सिर्फ फर्क समझाना है: डार्क वेब एक अलग नेटवर्क परत है, टेलीग्राम एक आम मैसेंजर है जिस पर अपराधियों ने दुकान जैसा व्यवहार चिपका लिया। दोनों को एक शब्द में मिलाना डर बढ़ाता है, समझ कम करता है।
डार्क वेब उस हिस्से को कहते हैं जो सामान्य ब्राउज़र और प्ले स्टोर ऐप से नहीं खुलता। उस परत तक पहुँचने के लिए खास अनाम नेटवर्क और छिपे सर्वर का जिक्र होता है। टेलीग्राम वैसा नहीं है। यह पब्लिक इंटरनेट पर चलने वाला मैसेजिंग ऐप है। डाउनलोड, अकाउंट, यूजरनेम, पब्लिक चैनल — ये सब सामान्य वेब की भाषा हैं, छिपे फोरम की नहीं।
जो लोग “नया डार्क वेब” कहते हैं, वे आमतौर पर तीन बातें जोड़ रहे होते हैं: पहचान छिपाना आसान लगना, बड़े पब्लिक चैनल, और बॉट से एक संदेश को तेजी से फैलाना। ये सुविधाएँ अपराधियों के काम आ सकती हैं। लेकिन सुविधा का दुरुपयोग ऐप को डार्क वेब नहीं बना देता। व्हाट्सऐप, सिग्नल या ईमेल पर भी धोखा होता है; कोई उन्हें डार्क वेब नहीं कहता।
एक और भ्रम यहाँ चिपकता है। बहुत से यूजर मानते हैं कि टेलीग्राम की हर चैट एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड है। असल में डिफॉल्ट क्लाउड चैट सर्वर पर स्टोर होती है। सीक्रेट चैट अलग ऑप्शन है, और ग्रुप-चैनल उस डिफॉल्ट पर नहीं चलते। यानी “पूरी तरह अदृश्य संदेश” वाला डर आधा टेक्निकल, आधा मार्केटिंग है। डार्क वेब वाली परत और मैसेंजर वाली परत को एक में मिलाना गलत नक्शा है।
सरकार ने “नया डार्क वेब” क्यों कहा
जून 2026 में केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा दिया। उसमें साफ लिखा गया कि टेलीग्राम “नया डार्क वेब” बन गया है और खतरे वाले लोग एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं। सरकार का तर्क यह था कि अपराधी चैनलों पर ऐसे लिंक डालते हैं जो आगे छिपे फोरम की ओर इशारा करते हैं, जिससे ट्रैक और पहचान मुश्किल हो जाती है। यह वाक्य रूपक है: ऐप को खुद डार्क वेब नहीं कहा जा रहा, उसे जोड़ने वाली दालान कहा जा रहा है।
इसी समय गृह मंत्रालय की इकाई I4C की रिपोर्ट का हवाला आया — शीर्षक मीडिया रिपोर्टिंग में
Report on Abuse of Telegram for Cybercrime (2026)
, तारीख 10 जून 2026। सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट में कहा कि प्लेटफॉर्म का ढाँचा प्रवर्तन को कमजोर करता है: एक अकाउंट कई बॉट बना सकता है, ब्लॉक के बाद मिरर बॉट नए नाम से लौट सकते हैं, यूजरनेम से फोन नंबर छिप सकता है। सरकार ने ये बातें आर्किटेक्चर की शिकायत के रूप में रखीं, न कि यह कहकर कि टेलीग्राम टोर जैसा नेटवर्क है।
दावे की सूची लंबी थी: साइबर फ्रॉड, नकली नौकरी और निवेश ग्रुप, परीक्षा सामग्री का दावा, ड्रग विज्ञापन, चरमपंथी प्रचार, और बाल शोषण सामग्री का आरोप। ये आरोप गंभीर हैं और इन्हें कोर्ट-दस्तावेज में सरकारी पक्ष के रूप में पढ़ना चाहिए — साबित सजा की सूची के रूप में नहीं। रूपक इसलिए चुना गया कि आम पाठक “डark वेब” शब्द से डरता है। डर काम करता है। समझ तब आती है जब शब्द को तोड़कर देखा जाए।
डार्क वेब और टेलीग्राम में असल फर्क

फर्क तीन जगह दिखता है। पहली, पहुँच। डार्क वेब की छिपी सेवा सामान्य ऐप स्टोर से नहीं मिलती। टेलीग्राम फोन पर बैठता है, सर्च होता है, लिंक फॉरवर्ड होता है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की वार्षिक रिपोर्ट 2025 में यही फर्क रेखांकित है: डार्कनेट बाजारों के मुकाबले ये प्लेटफॉर्म स्मार्टफोन से सुलभ हैं, इसलिए विज्ञापन की दहलीज नीची हो जाती है। यानी समस्या “छिपा जाल” नहीं, “आसान दुकान” है।
दूसरी, दृश्यता। पब्लिक टेलीग्राम चैनल लिंक वाले किसी भी व्यक्ति को दिख सकता है। डार्क वेब वाला छिपा बोर्ड वैसा पब्लिक नहीं होता। इसलिए कई स्कैम ग्रुप जानबूझकर पब्लिक चैनल चुनते हैं — ग्राहक ढूँढने के लिए अंधेरे की नहीं, भीड़ की जरूरत होती है। तीसरी, भुगतान और पहचान। गंभीर छिपे बाजार लंबे रेपुटेशन और जटिल भुगतान की बात करते हैं। टेलीग्राम वाले फ्रॉड अक्सर यूपीआई, म्यूल अकाउंट और नकली ऐप की ओर धकेलते हैं। यह सस्ता, तेज, और भारत के साइबर फ्रॉड से ज्यादा मेल खाता है।
इसलिए सही वाक्य यह है: कुछ अपराधी गतिविधियाँ जो पहले छिपे बाजारों से जुड़ी मानी जाती थीं, अब मैसेंजर के पब्लिक/प्राइवेट ग्रुप पर “दुकान की खिड़की” की तरह दिखती हैं। खिड़की दुकान नहीं होती। मैसेंजर डार्क वेब नहीं होता। जो हेडलाइन दोनों को एक कर दे, वह टेक्निकल नक्शा नहीं, डर का नक्शा बेच रही है।
FACT
I4C रिपोर्ट (10 जून 2026) के हवाले से मीडिया में राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल के ये आँकड़े आए — टेलीग्राम से जुड़ी शिकायतें: 2023 में 75,688 (₹1,359 करोड़), 2024 में 2,48,324 (₹1,940 करोड़), 2025 में 2,75,840 (₹3,086 करोड़), और 2026 जनवरी–मई में 88,713 (₹748 करोड़)। ये सरकारी दावे हैं, स्वतंत्र ऑडिट नहीं। हर शिकायत साबित फ्रॉड नहीं होती।
भारत में आम आदमी का टेलीग्राम-डर अक्सर डark वेब की फिल्मी छवि से नहीं, पैसे कटने से आता है। पैटर्न जाना-पहचाना है। कोई शेयर टिप ग्रुप, पार्ट-टाइम जॉब, लोन या क्रिप्टो रिटर्न का वादा करता है। ग्रुप में नकली स्क्रीनशॉट घूमते हैं। फिर अलग ऐप डाउनलोड करो, और पैसा डालो। निकलने पर गेट फँस जाता है। मुंबई जैसे शहरों में पुलिस ने ऐसे निवेश ग्रुप केस दर्ज किए हैं — कमिशन पर म्यूल अकाउंट और सिम चलाने वाले गिरफ्तार हुए। यह डark वेब टूरिज्म नहीं, क्लासिक साइबर फ्रॉड है जो मैसेंजर पर भीड़ जोड़ता है।
सरकार ने कोर्ट में यही बॉट-आर्किटेक्चर उठाया: एक यूजर कई स्वचालित अकाउंट चला सकता है, सामग्री फैल सकती है, और एक बॉट बंद होने पर दूसरा नाम लेकर लौट सकता है। प्रवर्तन की शिकायत यह है कि टेकडाउन अस्थायी रह जाता है। पाठक के लिए मतलब अलग है। कोई भी अजनबी लिंक, बॉट वाला “रजिस्टर करो” बटन, या ग्रुप एडमिन का प्रेशर — ये रेड फ्लैग हैं। इन्हें डark वेब का सबूत समझने की जरूरत नहीं। इन्हें ठगी का पुराना तरीका समझने की जरूरत है।
यहाँ एक और फिल्मी दावा चिपकता है — कि फोन खोलते ही लाल कमरे या हिटमैन की दुकान मिल जाएगी। सार्वजनिक जाँच और अदालती कहानियाँ बार-बार दिखाती हैं कि ऐसी “दुकान” के पेज अक्सर खुद स्कैम होते हैं। पैसे माँगना, डराना, फिर गायब होना। टेलीग्राम पर लिंक देखकर छिपे अपराध की दुनिया मान लेना उसी जाल का हिस्सा बन सकता है। डर बेचना भी धंधा है।
दिल्ली हाईकोर्ट, NEET और अस्थायी ब्लॉक
दावे की भारतीय जड़ सिर्फ रिपोर्ट नहीं, एक परीक्षा विवाद है। NEET-UG 2026 के पेपर लीक आरोपों के बाद मूल परीक्षा रद्द हुई, सीबीआई जाँच चलती रही, और रीटेस्ट 21 जून 2026 को तय हुआ। सरकार का पक्ष था कि आयोजित धोखाधड़ी नेटवर्क चैनलों पर सामग्री, बुकिंग और पैसे का दावा फैला रहे थे। एक चैनल का नाम अखबारों में “Neet Mafia” आया, सब्सक्राइबर संख्या करीब 18,617 बताई गई। ये आरोप जाँच के विषय हैं, साबित कहानी नहीं।
16 जून 2026 को मेइटी ने आईटी अधिनियम की धारा 69A के तहत अंतरिम निर्देश दिया: भारत में टेलीग्राम और संबंधित यूआरएल 22 जून तक ब्लॉक, मैसेज-एडिट फीचर 30 जून तक बंद। तर्क था कि बाद में संदेश संपादित कर यह भ्रम फैलाया जा सकता है कि पेपर परीक्षा से पहले लीक हो चुका था। टेलीग्राम ने रिट याचिका दायर की और कहा कि यह 15 करोड़ भारतीय यूजर्स पर अनुपातहीन बोझ है। 19 जून 2026 को जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने याचिका खारिज की। कोर्ट ने आपात स्थिति में प्रक्रिया पर्याप्त मानी और अस्थायी ब्लॉक को “कम से कम प्रतिबंधात्मक” कदम कहा।
यह फैसला प्लेटफॉर्म को हमेशा के लिए डark वेब घोषित नहीं करता। यह एक सीमित अवधि का एक्सेस ब्लॉक है, परीक्षा की अखंडता और पब्लिक ऑर्डर के तर्क पर। अदालत ने सरकार के हलफनामे के शब्दों को दोहराया, अपने से नया तकनीकी सिद्धांत नहीं गढ़ा। पाठक के लिए नतीजा साफ है: राज्य प्लेटफॉर्म को गेटवे मानकर कार्रवाई कर सकता है; इससे ऐप की तकनीकी परिभाषा नहीं बदलती।
अगस्त 2024 में टेलीग्राम के संस्थापक पावेल डुरोव को पेरिस के ले बूर्जे अड्डे पर हिरासत में लिया गया। फ्रांसीसी अभियोजक कार्यालय ने प्लेटफॉर्म पर अवैध लेनदेन, बाल यौन शोषण सामग्री, नशा तस्करी और धोखाधड़ी से जुड़े आरोपों की जाँच का जिक्र किया, साथ ही कानून-प्रवर्तन से सहयोग न करने का आरोप। कुछ दिन बाद औपचारिक जाँच के तहत आरोप तय हुए, जमानत करीब 50 लाख यूरो बताई गई, देश छोड़ने पर रोक रही। यह फ्रांस की आपराधिक प्रक्रिया है, भारत की सजा सूची नहीं।
केस इसलिए प्रासंगिक है कि दुनिया भर की सरकारें एक ही शिकायत दोहरा रही हैं: बड़े अनमॉडरेटेड चैनल + कम सहयोग = प्रवर्तन का सिरदर्द। डुरोव पक्ष का पुराना जवाब रहा है कि टेलीग्राम अराजकता का स्वर्ग नहीं, और मॉडरेशन उद्योग के दायरे में है। पाठक को दोनों स्वर सुनने चाहिए। न तो गिरफ्तारी साबित करती है कि हर यूजर अपराधी है, न ऐप की लोकप्रियता साबित करती है कि दुरुपयोग नहीं होता।
ग्लोबल दबाव और भारतीय हलफनामा एक ही दिशा में इशारा करते हैं: मैसेंजर अब सिर्फ परिवार का ग्रुप नहीं रहा, वह स्केल वाला पब्लिशिंग टूल भी है। स्केल अपराध को Invisible नहीं बनाता। वह अपराध को सस्ता और तेज बना सकता है। यही वजह है कि “नया डार्क वेब” वाला वाक्य अखबार में चिपक जाता है — भले तकनीकी शब्द गलत हो।
तो आखिर दावा किस चीज का है
दावा तीन स्तरों पर टूटता है। तकनीकी स्तर पर टेलीग्राम डार्क वेब नहीं। कानूनी-प्रशासनिक स्तर पर भारत सरकार ने इसे खतरे वालों को जोड़ने वाला प्लेटफॉर्म कहा, I4C आँकड़े और NEET वाले अस्थायी ब्लॉक के साथ। सामाजिक स्तर पर स्कैम ग्रुप, नकली टिप्स और डर वाले लिंक आम यूजर के पैसे काटते हैं — यही वह डर है जो हेडलाइन को घर तक ले जाता है।
सही सावधानी सरल है और नाटकीय नहीं। अजनबी निवेश/जॉब ग्रुप में पैसे मत डालो। सरकारी नाम, परीक्षा पेपर या “सीक्रेट मार्केट” का लिंक आए तो मानो ठगी का hook है, दरवाजा नहीं। साइबर फ्रॉड हो तो राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 और पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करो। छिपे नेटवर्क खोजने की कोशिश खुद कानूनी जोखिम बन सकती है। यह लेख उस रास्ते का नक्शा नहीं है।
अंत में एक लाइन याद रखने लायक है। डark वेब एक परत है। टेलीग्राम एक ऐप है। अपराध दोनों जगह हो सकता है, और सामान्य वेब पर भी होता है। शब्द मिलाकर डराना आसान है। फर्क बताना काम का है।
FAQ
क्या टेलीग्राम सच में डार्क वेब है?
नहीं। डार्क वेब छिपी नेटवर्क परत है। टेलीग्राम पब्लिक इंटरनेट का मैसेंजर है। सरकार का वाक्य रूपक है — गेटवे और दुरुपयोग की शिकायत, तकनीकी परिभाषा नहीं।
फिर सरकार ने वही शब्द क्यों इस्तेमाल किया?
दिल्ली हाईकोर्ट वाले हलफनामे में केंद्र ने कहा कि खतरे वाले लोग चैनलों के जरिए आगे छिपे फोरम से जुड़ते हैं और पहचान मुश्किल होती है। शब्द डर और प्रवर्तन की भाषा है, नेटवर्क साइंस की नहीं।
क्या हर टेलीग्राम ग्रुप खतरनाक है?
नहीं। करोड़ों लोग परिवार, पढ़ाई और न्यूज के लिए इस्तेमाल करते हैं। खतरा अजनबी पैसे-वाले वादे, बॉट लिंक और “गारंटी रिटर्न” वाले ग्रुप में है।
NEET वाले ब्लॉक का मतलब क्या था?
16–22 जून 2026 का अस्थायी एक्सेस ब्लॉक, धारा 69A के तहत, रीटेस्ट से पहले। दिल्ली हाईकोर्ट ने 19 जून को सरकार का कदम बरकरार रखा। यह हमेशा के लिए ऐप-प्रतिबंध का फैसला नहीं था।
स्कैम लगे तो क्या करें?
पैसे भेजना बंद करो, सबूत बचाओ, 1930 और cybercrime.gov.in पर शिकायत करो। छिपे फोरम या अवैध सामान खोजने की कोशिश मत करो — वह खुद जुर्म की ओर जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख डार्क वेब या अवैध बाजार तक पहुँचने की गाइड नहीं है। टोर सेटअप, ऑनियन लिंक, मार्केट या खरीद-फरोख्त का कोई तरीका यहाँ नहीं दिया गया। लाल-कमरा या हिटमैन जैसे दावे वाले पेज अक्सर ठगी होते हैं। अवैध सामान या सेवा माँगना अपराध है। आँकड़े सरकारी/अदालती दावे हैं, स्वतंत्र सत्यापन का दावा नहीं।