अनंत चतुर्दशी: अनंत डोरा किस हाथ में बांधें, भोग-मंत्र और घर पर 14 गांठ कैसे बनाएं
भाई-बहन, अनंत चतुर्दशी सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वो दिन है जब घर में विष्णु का अनंत रूप याद आता है, डोरा हाथ में बंधता है, और कई घरों में गणपति बप्पा का विसर्जन भी होता है। नीचे पूरा घर-पूजा गाइड है—किस हाथ में डोरा, क्या भोग, कौन-सा मंत्र, और हल्दी से 14 गांठ वाला सूत्र कैसे बनता है। चमत्कार के दावे नहीं, सिर्फ घर की श्रद्धा वाली बात।
आज अनंत चतुर्दशी है क्या? 2026 की तारीख और पंचांग वाली सच्चाई
अगर आपने सर्च किया है “आज अनंत चतुर्दशी है क्या”, तो सीधा जवाब ये है: साल-दर-साल तारीख बदलती है, क्योंकि यह अंग्रेजी कैलेंडर से नहीं, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी से चलती है। 2026 में अनंत चतुर्दशी शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को मानी जा रही है। कई पंचांगों में चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर की देर रात शुरू होकर 25 सितंबर की रात तक चलती दिखती है, इसलिए उदयातिथि यानी सूर्योदय के हिसाब से पूजा-व्रत का दिन 25 सितंबर लिया जाता है।
यही बात याद रखना बहुत जरूरी है—आपके शहर का पंचांग दिल्ली, मुंबई या बनारस से थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है। तिथि का आरंभ-समापन मिनटों में बदलता है। घर में पूजा तय करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग, मंदिर या परिवार के पुरोहित से एक बार देख लेना ही ठीक रहता है। कोई एक ऐप का स्क्रीनशॉट पूरी भारत की अंतिम सच्चाई नहीं बनता।
इस दिन का भाव साफ है। “अनंत” यानी जिसका ओर-छोर नहीं। भगवान विष्णु के इस रूप को अनंत पद्मनाभ भी कहा जाता है—शेषनाग की शैया पर विराजमान, लक्ष्मी के साथ, सृष्टि के पालन का प्रतीक। कई घरों में यह व्रत सालों से चलता है, कुछ में सिर्फ डोरा बांधकर सरल पूजा होती है। दोनों रास्ते श्रद्धा के हैं। जो पूरा उपवास नहीं कर सकते, वे फल-दूध या सात्त्विक भोजन रखकर भी भगवान का स्मरण कर सकते हैं। नियम परिवार के अनुसार अलग होते हैं, तुलना की जरूरत नहीं।
अनंत पद्मनाभ व्रत और गणेश विसर्जन: एक दिन, दो अलग भाव
महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक के कई शहरों और उत्तर भारत के गणेशोत्सव वाले इलाकों में दसवें दिन बप्पा का विसर्जन अनंत चतुर्दशी पर पड़ता है। ढोल-ताशा, “गणपति बप्पा मोरया” और जल-यात्रा उसी दिन दिखती है। उससे घर का अनंत व्रत रद्द नहीं हो जाता। विष्णु का अनंत रूप अलग देव-भाव है, गणेश जी की विदाई अलग स्नेह है। तारीख एक हो सकती है, पूजा का उद्देश्य एक नहीं।
दक्षिण भारत के कई परिवारों में यह दिन अनंत पद्मनाभ व्रत के नाम से और भी स्पष्ट चलता है। शेषशायी विष्णु की तस्वीर, सात्त्विक भोग और अनंत सूत्र इस पूजा के हिस्से हो सकते हैं। अलग राज्यों में विधि थोड़ी अलग मिलेगी, लेकिन केंद्र वही है: अनंत की शरण। जैन परंपरा में भी इसी तिथि पर कुछ समुदायों का अपना धार्मिक स्मरण जुड़ा माना जाता है; अलग परंपराओं को एक ही विधि बताकर गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए।
घर में अगर गणेश जी विराजमान हैं और उसी दिन अनंत डोरा भी बांधना है, तो क्रम शांत रखें। सुबह स्नान-पूजा, अनंत की स्थापना या तस्वीर के सामने दीप, फिर डोरा पूजन, और उसके बाद परिवार की सुविधा से विसर्जन की तैयारी की जा सकती है। बच्चों को सरल भाषा में बताइए: बप्पा घर से विदा हो रहे हैं, और अनंत डोरा पालनहार विष्णु का स्मरण है। एक रस्म को दूसरी का विकल्प न समझें।
व्रत की अवधि घर-घर बदलती है। कोई एक दिन उपवास रखता है, कोई 14 दिन सूत्र हाथ में रखकर नियमित पूजा करता है, और कोई वर्षों की परंपरा निभाता है। कौण्डिन्य और शीला की कथा कई घरों में सुनाई जाती है। कथा का उद्देश्य डर या गिनती नहीं, बल्कि भूल के बाद श्रद्धा से लौटने का भाव है।
घर पर हल्दी से अनंत डोरा कैसे बनाएं: 14 गांठ वाली सरल विधि
बाजार में लाल-पीला कलावा मिल जाता है, लेकिन घर का बना सूत्र और बात है। सामग्री सादी रखिए: नया सूती कलावा या कच्चा धागा, हल्दी पाउडर, थोड़ा गंगाजल या साफ जल, वैकल्पिक रूप से केसर या कुमकुम, और एक साफ थाली। रेशमी धागा भी कुछ घरों में चलता है; जो नया, मजबूत और साफ हो, वही ठीक है।
पहले हाथ और थाली धो लीजिए। धागे की लंबाई कलाई या बाजू के हिसाब से काटिए—बहुत छोटा न रखें, क्योंकि गांठों के लिए जगह चाहिए। हल्दी को थोड़े जल में घोलकर गाढ़ा लेप बनाइए। धागे को हल्के हाथ से रंगिए, ताकि रंग चढ़े लेकिन रेशा कमजोर न हो। उसे छाया या हल्की धूप में सुखा लीजिए; गीला सूत्र गांठ में फिसल सकता है।
अब बराबर दूरी पर 14 गांठ बांधिए। एक-एक गांठ पर “ॐ अनंताय नमः” या घर का विष्णु मंत्र धीरे से बोल सकते हैं। बच्चों से गिनती करवाना इस तैयारी का प्यारा हिस्सा है। चौदह गांठ चतुर्दशी की चौदहवीं तिथि और शास्त्रीय स्मृति में बताए गए चौदह लोकों का सामान्य प्रतीक मानी जाती हैं। यह कोई भाग्य की मशीन या गारंटी नहीं है; यह अनंत का स्मरण है।
सूखने के बाद सूत्र को पूजा में रखिए। भगवान की तस्वीर या छोटी मूर्ति के पास फूल, अक्षत और दीप रखकर उसका पूजन कीजिए। परिवार में जितने लोग सूत्र धारण करेंगे, उतने अलग सूत्र पहले से तैयार कर लेना अच्छा है। पूजा के बाद ही धारण करें। यदि धागा बहुत कड़ा हो, त्वचा में चुभे या एलर्जी हो तो उसे ढीला रखें और जरूरत हो तो उतार दें।
2026 में अनंत चतुर्दशी शुक्रवार 25 सितंबर मानी जा रही है—भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी। पुरुषों के लिए दाहिने और महिलाओं के लिए बाएं हाथ में सूत्र बांधना पारंपरिक प्रथा है। 14 गांठ चतुर्दशी और 14 लोकों के प्रतीक के रूप में समझी जाती हैं। गणेश विसर्जन अक्सर उसी दिन होता है, लेकिन अनंत पद्मनाभ व्रत उससे अलग विष्णु-पूजा है। स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
अनंत डोरा पुरुष और महिला किस हाथ में बांधें?

सबसे ज्यादा पूछा गया सवाल यही है। पारंपरिक रूप से पुरुष अनंत सूत्र दाहिने हाथ या दाहिनी बाजू पर बांधते हैं, जबकि महिलाएं बाएं हाथ या बाईं बाजू पर। कई परिवार कलाई पर बांधते हैं और कुछ ऊपरी बाजू पर। आज हाथ में बांधना सबसे आम दिखाई देता है। सूत्र भगवान को अर्पित और पूजित होने के बाद ही बांधना अच्छा माना जाता है।
यह नियम फैशन नहीं, घर की रीति है। दाहिना-बायां विभाजन कई वैदिक और गृह्य परंपराओं में पुरुष-स्त्री के अलग-अलग धारण से जुड़ा रहा है। अगर कोई परिवार सालों से अलग तरह से बांधता आया है और बुजुर्ग वही रीति सिखाते हैं, तो उस पर बहस करने के बजाय अपनी पारिवारिक परंपरा समझना उचित है। ट्रांसजेंडर या विशेष परिस्थिति वाले भक्त अपने आचार्य, मंदिर या घर के मार्गदर्शक से पूछकर सहज रीति अपना सकते हैं; श्रद्धा को एक ही सांचे में नहीं बांधा जा सकता।
बांधते समय गांठों को नाखून से खींचकर कसना जरूरी नहीं। सूत्र आराम से रहे, हाथ का रक्त-संचार न रुके और रोजमर्रा का काम हो सके। कुछ घर 14 दिन बाद इसे खोलते हैं, कुछ अगली अनंत चतुर्दशी तक रखते हैं। उतारते समय काटकर कूड़े में फेंकने के बजाय पूजा-स्थान में रखना, मिट्टी में सम्मान से रखना या स्थानीय स्वच्छ परंपरा के अनुसार विसर्जित करना बेहतर है। प्लास्टिक और सिंथेटिक कलावा जलस्रोत में न डालें।
पूजा सामग्री, संकल्प और घर की सरल विधि
बड़े मंदिर जैसी सजावट जरूरी नहीं। साफ चौकी या छोटी मेज, पीला या सफेद कपड़ा, विष्णु या पद्मनाभ की तस्वीर, दीपक, धूप, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, फूल, तुलसी दल, जल का लोटा, पंचामृत हो सके तो दूध-दही-घी-शहद-चीनी, और अनंत सूत्र पर्याप्त हैं। फल या घर की बनी मिठाई नैवेद्य के लिए रख सकते हैं।
स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनकर परिवार साथ बैठे तो अच्छा। पहले गणेश-स्मरण करें, फिर विष्णु का ध्यान। संकल्प सरल हिंदी में भी कहा जा सकता है: “आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को अनंत भगवान की पूजा करता/करती हूं और परिवार की शांति, सद्बुद्धि व सत्कर्म की प्रार्थना करता/करती हूं।” संस्कृत संकल्प का अभ्यास न हो तो गलत उच्चारण के डर से पूजा रोकने की जरूरत नहीं।
क्रम ऐसा रखा जा सकता है: आसन, शुद्ध जल, दीप, ध्यान, पुष्प-अक्षत, गंध, नैवेद्य, कथा या स्मरण, सूत्र पूजन और फिर धारण। पूरे षोडशोपचार संभव न हों तो जितना बन पड़े उतना कीजिए। अंत में हाथ जोड़कर क्षमा-प्रार्थना कीजिए—जो कमी रह गई, उसे अनंत भगवान स्वीकार करें। व्रत में निर्जला सबके लिए जरूरी नहीं। दूध-फल, एक समय सात्त्विक भोजन या प्याज-लहसुन रहित भोजन परिवार की शक्ति और परंपरा देखकर रखा जा सकता है। बीमार, गर्भवती, बच्चे और बुजुर्ग पर कठोर उपवास थोपना पूजा का उद्देश्य नहीं है।
अनंत चतुर्दशी पर भोग क्या लगाएं?
भोग का मतलब महंगी थाली नहीं, शुद्ध नैवेद्य है। घर में बना हलवा, पेड़ा, खीर, पायसम, मिश्री, दूध और मौसमी फल अच्छे विकल्प हैं। केला, सेब, अनार या नारियल रखा जा सकता है। तुलसी दल वैष्णव पूजा में विशेष भाव रखता है, पर वह साफ और श्रद्धा से अर्पित हो। जिस दिन गणेश विसर्जन भी हो, उस दिन के मोदक घर की परंपरा के अनुसार भोग या प्रसाद में रखे जा सकते हैं; बस अनंत पूजा का नैवेद्य सात्त्विक और साफ रखें।
कई वैष्णव घर प्याज-लहसुन रहित भोजन चढ़ाते हैं। बासी, झूठा या बहुत देर खुला रखा भोजन न रखें। घी की छोटी लौ, शक्कर-मिश्री या एक कटोरी फल भी पर्याप्त है अगर मन से चढ़ाया गया हो। पंचामृत बनाएं तो मात्रा जरूरत भर रखें और स्वच्छता का ध्यान रखें। पूजा के अंत में थाली कुछ समय भगवान के सामने रखिए, फिर परिवार को प्रसाद दीजिए। उपवास रखने वाले लोग अपने व्रत-नियम के अनुसार प्रसाद लें।
उत्तर, दक्षिण, महाराष्ट्र और गुजरात में भोग बदल सकता है। कहीं पूड़ी-हलवा, कहीं पायसम, कहीं फल और दूध प्रधान होते हैं। एक राज्य की थाली को ही एकमात्र सही बताने की जरूरत नहीं। भगवान को दिखावे से ज्यादा सात्त्विकता और साझा करने का भाव प्रिय समझा जाता है। प्रसाद पड़ोसी या जरूरतमंद के साथ बांटना इसी भावना को पूरा करता है।
अनंत चतुर्दशी मंत्र, आरती-स्तुति और सूत्र उतारने का भाव
मंत्र कम हों, उच्चारण साफ और मन उपस्थित हो। घर में प्रचलित सरल नाम-मंत्र हैं: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, “ॐ अनंताय नमः” और “ॐ नमो नारायणाय।” 11, 21 या 108 बार जप परिवार की सुविधा से हो सकता है। संख्या पूरी न हो पाए तो अपराध-बोध न रखें। नाम-स्मरण शांत मन से करना ही मुख्य बात है।
आरती के मामले में नई या नकली पंक्तियां बनाकर पारंपरिक पाठ बताना ठीक नहीं। अनंत भगवान की आरती घर-घर अलग धुन और शब्दों में मिल सकती है। परिवार में दादी-नानी या मंदिर में जो आरती चली आती है, वही गाइए। मंदिर की आरती सुनकर साथ देना भी सहज तरीका है।
बहुत छोटा सम्मानपूर्ण स्तुति-भाव रखना हो तो “शांतं जगन्नाथं, शेषशायी नमोऽस्तु ते” और “अनंतं अच्युतं गोविंदं, वंदे विष्णुं सनातनम्” जैसी प्रचलित भाव-पंक्तियां स्मरण में ली जा सकती हैं; इन्हें पूरी आरती का प्रमाणित पाठ न समझें। यदि घर की लय इससे अलग हो, तो चुपचाप प्रणाम करना भी पर्याप्त है। पूजा के बाद पुष्पांजलि, सूत्र-धारण और प्रसाद का क्रम शांत रहता है।
डोरा बंध गया तो रस्म पूरी मानकर छोड़ देना जरूरी नहीं। सूत्र रहते हुए झूठ, क्रोध और अहंकार कम करने की कोशिश पुराने लोग व्रत का हिस्सा मानते थे। नौकरी, लॉटरी या किसी चमत्कार की गारंटी के रूप में अनंत व्रत को पेश करना ठीक नहीं। यह पालनहार विष्णु का स्मरण, धैर्य और सद्भाव का अवसर है। रोज थोड़ा जप, तुलसी को जल और परिवार से नम्र बात जैसे छोटे संकल्प इस भाव को घर में टिकाते हैं।
जो परिवार 14 दिन सूत्र रखते हैं, वे अवधि पूरी होने पर स्नान या पूजा के बाद आदर से खोलते हैं। कुछ घर अगले वर्ष नया सूत्र आने तक रखते हैं। अपनी परंपरा स्पष्ट न हो तो बुजुर्ग या स्थानीय पुरोहित से पूछ सकते हैं। सूती धागे को पूजा-स्थान, तुलसी की मिट्टी या स्वच्छ स्थान पर रखना कई घरों में मान्य है। जल में छोड़ते समय स्थानीय नियम और पर्यावरण दोनों याद रखें।
पुराने वर्णनों में 14 वर्ष तक व्रत करने का उल्लेख मिलता है, लेकिन इसे डर या दबाव न बनाएं। कोई वर्ष छूट जाए तो श्रद्धा खत्म नहीं होती; फिर से पूजा में बैठ जाना ही लौटना है। स्त्री-पुरुष, अविवाहित, गृहस्थ और अलग उम्र के भक्त अपनी क्षमता से पूजा कर सकते हैं। यदि उसी दिन गणेश विसर्जन की भीड़ हो तो अनंत पूजा सुबह शांत समय में कर लेना सुविधाजनक रहता है।
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FAQ: अनंत चतुर्दशी, डोरा और पूजा से जुड़े सवाल
2026 में अनंत चतुर्दशी कब है?
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी मानी जा रही है। यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी है। तिथि के शुरू और खत्म होने का समय शहर के अनुसार अलग हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखें।
अनंत डोरा पुरुष और महिला किस हाथ में बांधें?
परंपरा से पुरुष दाहिने हाथ या बाजू पर और महिलाएं बाएं हाथ या बाजू पर बांधती हैं। परिवार की पुरानी रीति अलग हो तो घर के बड़े और स्थानीय परंपरा को महत्व दें।
14 गांठ क्यों लगाते हैं?
चतुर्दशी चौदहवीं तिथि है और शास्त्रीय स्मृति में चौदह लोकों का उल्लेख मिलता है। 14 गांठ उसी प्रतीकात्मक स्मरण से जोड़ी जाती हैं; ये जादुई गारंटी नहीं हैं।
अनंत चतुर्दशी पर भोग में क्या चढ़ाएं?
फल, हलवा, खीर, पेड़ा, पायसम, दूध, मिश्री, तुलसी दल और सात्त्विक घर का बना नैवेद्य चढ़ा सकते हैं। बासी या झूठा भोजन न रखें।
अनंत चतुर्दशी का मंत्र और आरती कौन-सी है?
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, “ॐ अनंताय नमः” और “ॐ नमो नारायणाय” सरल मंत्र हैं। आरती परिवार की परंपरा या मंदिर से सुनकर गाएं; अनिश्चित पंक्तियों को प्रमाणित आरती बताकर न गढ़ें।
यह लेख घर की श्रद्धा और सामान्य पारंपरिक जानकारी के लिए है, किसी एक मठ या पुरोहित का अंतिम आदेश नहीं। तारीख, मुहूर्त और विधि स्थानीय पंचांग व परिवार के आचार्य के अनुसार लें। व्रत स्वास्थ्य और परिस्थिति देखकर रखें। भगवान अनंत हैं—हमारी समझ सीमित। जो कमी रह गई, उसे क्षमा मानकर चरणों में रख देना ही सबसे सरल आरती है।