सुखकर्ता दुखहर्ता आरती — पूरा पाठ (Ganesh Aarti Lyrics Hindi/Marathi)
घर में दीया जलाते ही मुँह से “सुखकर्ता…” निकल जाता है, फिर बीच में रुक जाते हैं। पूरा पाठ याद नहीं रहता, अर्थ भी साफ नहीं। नीचे वही पारंपरिक मराठी आरती पूरी पंक्तियों में है, हल्का सरल भाव के साथ, और घर या मंडप में कब गाएँ—ये बात साफ है।
लोग “सुखकर्ता…” अधूरा क्यों सर्च करते हैं
बहुत से भक्त बचपन से सुनते आए हैं। माता-पिता आरती शुरू करते हैं, बच्चे साथ में “जय देव जय देव” जोड़ देते हैं। स्कूल के बाद, नौकरी के शहर में आकर पूरा पाठ टूट जाता है। फोन पर टाइप करते समय भी सिर्फ़ पहली पंक्ति लिखते हैं—सुखकर्ता दुखहर्ता—बाकी भूल जाते हैं कि आगे “वार्ता विघ्नाची” आता है या “नुरवी पुरवी”।
ये आरती सिर्फ़ महाराष्ट्र की नहीं रह गई। उत्तर भारत के घरों में भी गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और रोज़ की शाम की आरती में यही स्वर बजता है। इसलिए सर्च अधूरी रहती है: लोग पूरा पाठ चाहते हैं, गलत लाइन नहीं, नया गाना नहीं। जो पाठ दादा-दादी के मुँह से सुना, वही चाहिए।
याद रखने की एक और वजह है। मंडप पर जब ढोल-मंजीरा तेज़ होता है, तब पहली दो पंक्तियाँ तो निकल जाती हैं, तीसरी चौथी अटक जाती है। घर में अकेला गाते समय भी वही अटकन होती है। इसलिए पूरा पाठ एक जगह, सही क्रम में रखना ज़रूरी है। अर्थ भी उतना ही सरल चाहिए जितना आरती का स्वर—कोई भारी टीका नहीं, सिर्फ़ इतना कि मुँह से निकलते समय मन समझे कि हम किसे पुकार रहे हैं।
जो भक्त गणेश भजन के नाम के साथ-साथ आरती भी ढूँढते हैं, उन्हें एक ही बात चाहिए: सही शब्द, सही क्रम, और घर में कब खड़े होकर गाएँ। यही नीचे है।
सुखकर्ता दुखहर्ता आरती का पूरा पारंपरिक पाठ

नीचे वही पारंपरिक मराठी पाठ है, जिस क्रम में गाया जाता है। पंक्तियाँ बदलकर नया रूप नहीं बनाया गया। कुछ जगहों पर वर्तनी थोड़ी अलग दिख सकती है—दुःखहर्ता या दुखहर्ता, जय देव की जुगलबंदी—लेकिन मूल पंक्तियाँ यही रहती हैं। हर बंद के बाद “जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती” आता है; दर्शनमात्रे वाली पंक्ति भी उसी लय में जुड़ती है।
पहला बंद
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ॥
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनःकामना पूर्ती ॥
दूसरा बंद
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुंकुम केशरा ॥
हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा ।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरियां ॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनःकामना पूर्ती ॥
तीसरा बंद
लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना ।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना ॥
दास रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकष्टी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना ॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनःकामना पूर्ती ॥
गाते समय बीच में साँस लेने की जगह इन्हीं पूर्ण विराम और दोहरे दंड पर है। जल्दी-जल्दी निगलने से शब्द गिरते हैं। घर में धीरे गाओ, मंडप में समूह के स्वर के साथ मिलाओ। “जय देव जय देव” हर बंद के बाद दोहराया जाता है—ये कोरस है, काटने की चीज़ नहीं।
इन पंक्तियों का सरल भाव क्या है
पहला बंद सीधे नाम लेता है। सुख देने वाले, दुख हरने वाले, विघ्न की बात मिटाने वाले। फिर प्रेम और कृपा—जो पूरी करते हैं, जो मन को नर्म रखते हैं। उसके बाद रूप: सारे अंगों पर सुंदर शेंदूर की उटी, गले में मोतियों की माला। ये चित्र है, ताकि आँख बंद करके भी मूर्ति सामने आ जाए। जय मंगलमूर्ति कहकर भक्त कहता है—दर्शन भर से मन की कामना पूरी होने का विश्वास।
दूसरा बंद आभूषण और श्रृंगार है। रत्न जड़े हुए फरा, गौरी के कुमार, चandan-कुंकुम-केसर की उटी, हीरे जड़ा मुकुट, चरणों में नूपुर और घाघरियों की रुणझुण। ये शृंगार भक्ति है। बच्चे भी समझते हैं: बाप्पा सज गए हैं, हम आरती उतार रहे हैं। भारी दर्शनशास्त्र यहाँ ज़रूरी नहीं। बस इतना कि हम खाली हाथ नहीं खड़े, हमने रूप देखा और नाम लिया।
तीसरा बंद रूप के बाद विनती है। लंबोदर, पीतांबर, सर्प का बंधन, सीधी सूँड़, वक्रतुंड, तीन नेत्र—पहचान की पंक्तियाँ। फिर रामदास की प्रतीक्षा वाले घर की बात, संकट में पाना, निर्वाण तक रक्षा, देवताओं का वंदन। घर के लिए ये पंक्ति सबसे पास की है। नौकरी अटकी हो, परीक्षा हो, बीमारी का दौर हो—लोग यहीं आवाज़ ऊँची करते हैं। जय देव फिर आता है, ताकि विनती अकेली न रह जाए, समूह का जयकारा उसके साथ रहे।
अर्थ रटने के लिए नहीं है। एक बार पढ़ लो, फिर गाते समय वही चित्र आँख के सामने रहे। अधूरी सर्च इसलिए होती है क्योंकि लोग अर्थ की किताब नहीं, मुँह का पाठ चाहते हैं। पाठ ऊपर है; भाव इतना काफी है कि श्रद्धा ठंडी न पड़े।
घर में ये आरती कब गाएँ
रोज़ की शाम सबसे सहज समय है। दीया, अगरबत्ती, थोड़ी सी फूलमाला, बाप्पा के सामने खड़े होकर तीनों बंद। जल्दी हो तो भी कोरस मत काटो। संकष्टी चतुर्थी की शाम कई घरों में व्रत के बाद यही आरती होती है। गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक रोज़ मंडप या घर के छोटे मंदिर में गा सकते हो।
नई मूर्ति आने पर, विसर्जन से पहले की आखिरी शाम, और जब घर में कोई शुभ काम शुरू हो—नया काम, यात्रा, पढ़ाई का पहला दिन—तब भी यही स्वर चलता है। रात को सोने से पहले धीमे स्वर में पहला बंद भी काफी लोग गाते हैं, पूरा पाठ याद हो तो तीनों। ज़ोर से गाने की शर्त नहीं। घर में परिवार साथ हो तो एक व्यक्ति पंक्ति बोले, बाकी जय देव जोड़ें।
थाली में दीया घुमाते समय पाठ अधूरा न हो, इसलिए पहले एक बार बैठकर पढ़ लेना ठीक रहता है। बच्चे साथ हों तो सिर्फ़ पहली चार पंक्तियाँ और जय देव सिखाओ; बाकी धीरे जुड़ जाएगा। जबरदस्ती तेज़ लय से शब्द टूटते हैं, श्रद्धा भी टूटती है।
मंडप, पंडाल और सामूहिक आरती
पंडाल में आरती का समय तय होता है—अक्सर शाम की बड़ी आरती। माइक पर एक मुख्य स्वर, पीछे भीड़। भीड़ में पहली पंक्ति सबको आती है, तीसरा बंद कई बार गिर जाता है। इसलिए जो सेवा में गा रहे हैं, उन्हें पाठ सामने रखना चाहिए—कागज़ हो या याद। गलत शब्द जोड़कर “आसान” बनाने से पारंपरिक लय बिगड़ती है।
मंडप में ढोल-नागाड़ा हो तो भी शब्द साफ रहें। जय देव जय देव पर ताली और जयकारा स्वाभाविक है; दर्शनमात्रे वाली पंक्ति को हड़बड़ी में निगलना ठीक नहीं। विसर्जन की यात्रा में भी यही आरती चलती है। सड़क पर पूरा पाठ मुश्किल हो तो बंद-दर-बंद दोहराओ, कोरस मत छोड़ो।
घर का छोटा मंडप और चौराहे का बड़ा पंडाल—दोनों जगह बाप्पा एक हैं। फर्क सिर्फ़ स्वर की ताकत का है। श्रद्धा वही रखो जो मंदिर के सन्नाटे में रखते हो।
गाते समय सरल रीति और श्रद्धा
हाथ जोड़ो या थाली थामो—जैसा घर का रिवाज है। मुँह से शब्द साफ निकले, ये काफी है। शेंदूर, चandan, फूल—जो सामने हो, उसी से आरती का चित्र पूरा हो जाता है। पाठ के दौरान बातचीत कम रखो। फोन पर वीडियो बनाते समय भी पंक्तियाँ न कटो।
अगर आवाज़ नहीं है, तो मन में पढ़ना भी आरती है। बुजुर्ग बैठकर सुनें, युवा खड़े होकर गाएँ—ये बँटवारा घर-घर अलग है, कोई पाप-पुण्य की सूची नहीं। बस इतना: अधूरा पाठ दोहराने से बेहतर है पूरा पाठ धीरे गाना।
रामदास वाली पंक्ति कई घरों में सबसे प्रिय है। संकट के दिन लोग यहीं रुककर आँख बंद करते हैं। ये नाटक नहीं, पुरानी आदत है। आदत को हल्के में मत लो, और न ही इसे डरावना बनाओ। बाप्पा से बात है, डर की दुकान नहीं।
FAQ
सुखकर्ता दुखहर्ता आरती किस भाषा में है?
मूल पाठ मराठी है। पूरे भारत में वही पंक्तियाँ गाई जाती हैं। हिंदी में अर्थ समझकर गा सकते हो, शब्द बदलने की ज़रूरत नहीं।
हर बंद के बाद जय देव क्यों दोहराते हैं?
ये कोरस है। मंगलमूर्ति को जय कहते हैं, और दर्शन से मन की बात पूरी होने का विश्वास जोड़ते हैं। काटने से आरती अधूरी लगती है।
क्या घर में रोज़ गाना ज़रूरी है?
ज़रूरी कोई पुलिस नहीं लगाती। शाम की आरती बहुत घरों की आदत है। संकष्टी और गणेशोत्सव में लोग ज़्यादा नियमित रहते हैं।
पाठ कहीं-कहीं अलग क्यों दिखता है?
वर्तनी और थोड़ी उच्चारण की फर्क से। मूल तीन बंद और जय देव वाला भाग वही रहता है। नई पंक्तियाँ जोड़कर “अपना वर्जन” बनाना ठीक नहीं।
अर्थ नहीं आता तो गा सकते हैं?
हाँ। शब्द श्रद्धा से गाओ। सरल भाव ऊपर लिखा है; रटने की परीक्षा नहीं है।
यह पाठ श्रद्धा और घर के रिवाज के लिए है। चिकित्सा, कानूनी या किसी वादे का दावा नहीं। अपने परिवार के पुराने स्वर और मंदिर की परंपरा को आगे रखें।