बरसात की शुरुआत होते ही खेतों की मेड़ों, बाग-बगीचों और रास्तों के किनारे एक खास पौधा अपनी छटा बिखेरने लगता है—जिसे गांव-देहात में तिवरैया और आम बोलचाल में गुलमेहंदी (Balsam) कहा जाता है। इसके हल्के गुलाबी और जामुनी रंग के पंखुड़ियों वाले फूल हरी-भरी पत्तियों के बीच ऐसे चमकते हैं मानो प्रकृति ने कोई कालीन बिछा दिया हो।
तिवरैया (गुलमेहंदी) की सादगी और पहचान
इस पौधे की सबसे अनोखी बात इसके बीजों की थैली है। जैसे ही इसके बीज पकते हैं, उन्हें हल्के से छूने पर वे झटके से चटक कर दूर जा गिरते हैं, इसीलिए अंग्रेजी में इसे ‘टच-मी-नॉट’ प्रजाति (Impatiens balsamina) से जोड़ा जाता है। इसके फूल नाजुक होते हैं और इनकी बनावट तितली जैसी लगती है।
- प्राकृतिक खिलना: यह पौधा खासकर मानसूनी नमी में तेजी से बढ़ता है और बिना ज्यादा देखभाल के घनी झाड़ी का रूप ले लेता है।
- पारंपरिक उपयोग: पुराने समय में ग्रामीण इलाकों में इसकी पत्तियों और फूलों का उपयोग हाथ रंगने और त्वचा की ठंडक के लिए देशी नुस्खों में किया जाता रहा है।
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