रक्षाबंधन के ठीक अगले दिन, यानी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से बुंदेलखंड अंचल में कजलियां (भुजरिया) का पारंपरिक लोकपर्व बड़े उल्लास से मनाया जाता है। यह त्योहार केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आपसी सौहार्द, समृद्धि और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अनूठा उत्सव है।
कजलियां और भुजरिया पर्व का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
बुंदेलखंड की माटी में कजलियां का संबंध आल्हा-ऊदल और महोबा के ऐतिहासिक शौर्य से भी जुड़ा हुआ है। श्रावण मास में बोए गए गेहूं या जौ के ज्वारे जब अंकुरित होकर सुनहरी घास का रूप लेते हैं, तो उन्हें ‘भुजरिया’ या ‘कजली’ कहा जाता है। प्रतिपदा के दिन इन भुजरियों की पूजा-अर्चना के बाद इन्हें जलाशयों में विसर्जित या धोया जाता है, और फिर बड़ों के कानों पर या हाथों में रखकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
यह पर्व क्यों है इतना खास?
- आपसी मेल-मिलाप: पुराने गिले-शिकवे भुलाकर गले मिलने और कजलियां भेंट करने की यह परंपरा सामाजिक समरसता को मजबूत करती है।
- कृषि और प्रकृति की पूजा: अंकुरित भुजरियां आने वाली फसल की अच्छी पैदावार और घर-परिवार में खुशहाली का संकेत मानी जाती हैं।
- पारंपरिक उल्लास: गांवों और शहरों में ढोल-नगाड़ों के साथ सामूहिक रूप से भुजरिया विसर्जन की शोभायात्रा निकाली जाती है।
इस पावन अवसर पर अपने परिजनों, मित्रों और सगे-संबंधियों को शुभकामनाएं देने के लिए हमने यहाँ पारंपरिक एवं आकर्षक कजलियां-भुजरिया पर्व HD वॉलपेपर, ग्रीटिंग्स और स्टेटस का विशेष संग्रह तैयार किया है। इन सुंदर तस्वीरों को डाउनलोड करके आप व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर साझा कर सकते हैं।
ये भी पढ़ें
- सुप्रभात और सकारात्मक विचार इमेजेस
- ॐ नमः शिवाय HD धार्मिक वॉलपेपर
- गुरु पूर्णिमा पर पारंपरिक उपहार विचार
- शुभ रात्रि वॉलपेपर और सुंदर फोटो








