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सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी लिरिक्स: संपूर्ण आरती, अर्थ और नवरात्रि में इसका महत्व

सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी लिरिक्स: संपूर्ण आरती, अर्थ और नवरात्रि में इसका महत्व

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भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक: सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी

भारत की पावन भूमि पर देवी-देवताओं की स्तुति में गाए जाने वाले भजन और आरतियां हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रिय और हृदयस्पर्शी आरती है ‘सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी’। यह आरती विशेष रूप से मां दुर्गा, जिन्हें पार्वती के रूप में भी पूजा जाता है, को समर्पित है। ‘पर्वतवासनी’ नाम से ही स्पष्ट है कि यह उन देवी को पुकारती है, जो पर्वतों में निवास करती हैं, खासकर हिमालय पुत्री मां पार्वती को।

यह आरती सिर्फ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भक्तों की अटूट श्रद्धा, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। जब नवरात्रि जैसे पावन पर्व आते हैं, तब हर घर, हर मंदिर में इस आरती की गूँज सुनाई देती है, जो वातावरण को भक्तिमय बना देती है। आइए, आज हम इस दिव्य आरती के संपूर्ण बोल, इसके गहरे अर्थ और आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से समझते हैं, ताकि आपकी भक्ति और भी प्रगाढ़ हो सके।

‘सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी’ आरती के बोल

यहां प्रस्तुत हैं ‘सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी’ आरती के संपूर्ण और शुद्ध बोल, ताकि आप इसे सही उच्चारण और भाव के साथ गा सकें:

सुन मेरी देवी मैया पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां।
सुन मेरी देवी मैया पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

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पान सुपारी ध्वजा नारियल ले, तेरी भेंट चढ़ाया हो मां।
सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

सुवा चोली तेरी अंग विराजे, केसर तिलक लगाया हो मां।
सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

नंगे पग मां अकबर आया, सोने का छत्र चढ़ाया हो मां।
सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

ऊँचे पर्वत बनयो देवालाया, नीचे शहर बसाया हो मां।
सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

सत्युग, द्वापर, त्रेता मध्ये, कलियुग राज सवाया हो मां।
सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

धूप दीप नैवेद्य आरती, ले तेरी भेंट चढ़ाया हो मां।
सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

जो कोई मैया तेरे दर पे आवे, मुँह माँगी मुरादें पाया हो मां।
सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी, कोई तेरा पार ना पाया हो मां॥

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पर्वतवासनी मां: नाम का अर्थ और उनका स्वरूप

‘पर्वतवासनी’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘पर्वत’ और ‘वासिनी’, जिसका अर्थ है ‘पर्वतों में निवास करने वाली’। यह नाम सीधे तौर पर मां पार्वती से जुड़ा है, जो हिमालयराज की पुत्री हैं। मां पार्वती को शक्ति का स्वरूप माना जाता है और वे भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं। वे प्रेम, त्याग, तपस्या और शक्ति की प्रतीक हैं।

  • शक्ति का स्रोत: मां पार्वती ही दुर्गा, काली, चंडी आदि अनेक रूपों में प्रकट होकर दुष्टों का संहार करती हैं और धर्म की रक्षा करती हैं।
  • पर्वतों से जुड़ाव: पर्वतों को हमेशा से पवित्र और ध्यान का स्थान माना गया है। मां का पर्वतों में वास करना यह दर्शाता है कि वे प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति हैं और शांत व स्थिर ऊर्जा का केंद्र हैं।
  • भक्तों का आश्रय: जैसे पर्वत अटल होते हैं, वैसे ही मां अपने भक्तों के लिए अटल सहारा हैं।

आरती का आध्यात्मिक महत्व और गहरा अर्थ

यह आरती केवल देवी की स्तुति नहीं, बल्कि जीवन के गहरे दर्शन को भी समेटे हुए है। आइए इसके हर पद के आध्यात्मिक अर्थ को समझते हैं:

‘कोई तेरा पार ना पाया हो मां’ – असीमित महिमा का गुणगान

यह पंक्ति मां की असीमित महिमा और शक्ति को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि मां की लीलाएं इतनी विशाल और गहरी हैं कि कोई भी उनकी पूर्णता को समझ नहीं सकता, उनकी शक्ति का अंत नहीं पा सकता। यह भक्तों के मन में विनम्रता और awe (विस्मय) का भाव जगाता है।

‘पान सुपारी ध्वजा नारियल ले, तेरी भेंट चढ़ाया हो मां’ – समर्पण का भाव

यह पद भक्तों द्वारा मां को श्रद्धापूर्वक चढ़ाई जाने वाली सरल भेंटों का उल्लेख करता है। पान, सुपारी, ध्वजा (झंडा) और नारियल भारतीय पूजा पद्धति में अत्यंत शुभ माने जाते हैं। ये वस्तुएं केवल प्रतीक हैं; असली भेंट तो भक्त का शुद्ध हृदय और समर्पण का भाव होता है। यह दर्शाता है कि मां को आडंबर नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा प्रिय है।

‘सुवा चोली तेरी अंग विराजे, केसर तिलक लगाया हो मां’ – सौंदर्य और सम्मान

यहां मां के दिव्य स्वरूप का वर्णन है, जिसमें उन्हें सुंदर सुवा चोली (वस्त्र) पहने हुए और माथे पर केसर का तिलक लगाए हुए दिखाया गया है। यह मां के सौंदर्य, उनकी पवित्रता और उनके राजसी स्वरूप का गुणगान है। भक्त मां के इस रूप का ध्यान करके उनके प्रति अपना आदर और प्रेम व्यक्त करते हैं।

‘नंगे पग मां अकबर/आल्हा आया, सोने का छत्र चढ़ाया हो मां’ – भक्ति की सार्वभौमिकता

यह पद दर्शाता है कि मां की भक्ति किसी धर्म, जाति या समय-सीमा से बंधी नहीं है। अकबर या आल्हा जैसी ऐतिहासिक/पौराणिक शख्सियतों का उल्लेख यह बताता है कि बड़े-बड़े राजा और योद्धा भी मां के चरणों में नंगे पैर चलकर आते थे और उन्हें सोने का छत्र (राजसी सम्मान का प्रतीक) चढ़ाते थे। यह मां की सर्वव्यापकता और हर किसी को अपनी शरण में लेने की क्षमता को दर्शाता है।

‘ऊँचे पर्वत बनयो देवालाया, नीचे शहर बसाया हो मां’ – दिव्य निवास और जनजीवन

यह पंक्ति मां के पवित्र निवास स्थान का वर्णन करती है, जो ऊँचे पर्वतों पर स्थित है, जबकि नीचे की ओर शहर बसे हुए हैं। यह दर्शाता है कि मां भले ही दिव्य और अगम्य स्थानों पर वास करती हों, लेकिन उनकी कृपा और आशीर्वाद शहरों में रहने वाले आम जनजीवन तक भी पहुँचता है। यह प्रकृति और आध्यात्मिकता के जुड़ाव को भी दर्शाता है।

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‘सत्युग, द्वापर, त्रेता मध्ये, कलियुग राज सवाया हो मां’ – समय की सीमाओं से परे

यह पद मां की शाश्वत उपस्थिति और शक्ति को उजागर करता है। यह कहता है कि मां की सत्ता सत्युग, द्वापर और त्रेता युगों में भी थी, और कलियुग में भी उनकी महिमा सवाई (बढ़ी हुई) है। इसका अर्थ है कि मां हर युग में अपने भक्तों का कल्याण करती हैं और उनकी रक्षा करती हैं, और कलियुग में तो उनकी कृपा और भी अधिक सुलभ है।

‘जो कोई मैया तेरे दर पे आवे, मुँह माँगी मुरादें पाया हो मां’ – फलदायी भक्ति

यह अंतिम पद भक्तों को आशा और विश्वास दिलाता है कि जो भी सच्चे मन से मां के द्वार पर आता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह मां की दयालुता, भक्तों के प्रति उनके प्रेम और उनकी वरदान देने की शक्ति को दर्शाता है।

नवरात्रि में पर्वतवासनी मां की विशेष पूजा

नवरात्रि का पावन पर्व मां दुर्गा की शक्ति और भक्ति का उत्सव है। इन नौ दिनों में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है, और ‘पर्वतवासनी’ मां इन सभी रूपों का मूल स्रोत हैं। नवरात्रि के दौरान इस आरती को गाना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

  • शक्ति का आह्वान: यह आरती नवरात्रि में मां की शक्ति का आह्वान करती है, जिससे भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा और आंतरिक बल मिलता है।
  • शुभता का संचार: घर में इस आरती का पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं।
  • मनोकामना पूर्ति: नवरात्रि के विशेष दिनों में इस आरती को भावपूर्वक गाने से मां प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी करती हैं।
  • सामुदायिक भक्ति: मंदिरों और घरों में लोग एक साथ मिलकर इस आरती को गाते हैं, जिससे भक्ति का माहौल और भी गहरा हो जाता है।

अपनी भक्ति को गहरा करने के सरल मार्ग

मां पर्वतवासनी की कृपा पाने और अपनी भक्ति को और भी गहरा करने के लिए कुछ सरल उपाय अपनाए जा सकते हैं:

  • नियमित पाठ: प्रतिदिन या विशेष रूप से मंगलवार, शुक्रवार और नवरात्रि में इस आरती का पाठ करें।
  • भाव पर ध्यान: केवल शब्दों को दोहराने के बजाय, आरती के अर्थ और मां के प्रति अपने प्रेम पर ध्यान केंद्रित करें।
  • स्वच्छता और पवित्रता: पूजा करते समय शारीरिक और मानसिक स्वच्छता बनाए रखें।
  • निस्वार्थ सेवा: जरूरतमंदों की सेवा करें, क्योंकि मां हर जीव में वास करती हैं।
  • ध्यान और प्रार्थना: आरती के बाद कुछ देर शांत बैठकर मां का ध्यान करें और उनसे अपनी भावनाएं व्यक्त करें।

निष्कर्ष

‘सुन मेरी देवी मां पर्वतवासनी’ आरती केवल एक भजन नहीं, बल्कि भक्तों के लिए मां से जुड़ने का एक सीधा और सरल माध्यम है। इसके बोलों में मां की असीमित महिमा, उनकी दयालुता और उनकी शक्ति का सार छिपा है। जब आप इस आरती को सच्चे हृदय से गाते हैं, तो आप न केवल मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, बल्कि अपने भीतर भी शांति, शक्ति और सकारात्मकता का अनुभव करते हैं। उम्मीद है कि यह लेख आपको इस दिव्य आरती के गहरे अर्थ और महत्व को समझने में सहायक होगा और आपकी भक्ति यात्रा को और भी समृद्ध करेगा। जय माता दी!

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