11 सितंबर 2001। AP फोटोग्राफर Richard Drew ब्रायंट पार्क में मैटर्निटी फैशन शो कवर कर रहे थे। दफ्तर से फोन आया: प्लेन टावर से टकराया। वे सबवे से चेम्बर्स स्ट्रीट उतरे। उत्तर टावर के ऊपरी फ़्लोर से लोग खिड़कियों पर थे। ड्रू ने सीक्वेंस काटा। एक फ्रेम में आदमी इमारत की लकीरों के साथ सीधा दिखता है। अखबारों ने उसे The Falling Man कहा।
हम वह शरीर यहाँ नहीं छापते। न पोज, न सीधा गिरता फ्रेम। यह लेख उसी सुबह, उसी कैमरे, उसी विवाद की कहानी है। ऊपर क्या हुआ, कैसे निकले — विस्तार नहीं। मौत तय थी। तस्वीर ने उसे एक नामहीन सेकंड बना दिया।
फॉलिंग मैन 2001 कैसे बनी
ड्रू तब 54 के थे। कैमरा फॉलो कर रहा था, शटर अपने चक्र पर चला। उन्होंने बाद में कहा: आठ-नौ फ्रेम हैं, एक में शरीर बिलकुल लंबवत आ गया। “तस्वीर मैंने नहीं ली।” दूसरे टावर गिरते समय उन्हें खींचकर बचाया गया।
अगले दिन कुछ अखबारों ने छापा। प्रतिक्रिया तेज़ आई — परिवार, पाठक, संपादक। कई ने पेज काट दिए। टीवी ने भी गिरते लोगों के क्लिप रोक दिए। फ्रेम “सबसे मशहूर तस्वीर जो किसी ने नहीं देखी” कहलाने लगा, हालाँकि देखी तो गई थी। 2003 में टॉम जूनोद का एस्क्वायर निबंध इसे निबंध की वस्तु बना गया।
पहचान पक्की नहीं। अटकलें Jonathan Briley (विंडोज़ ऑन द वर्ल्ड, साउंड इंजीनियर) और Norberto Hernandez (पेस्ट्री शेफ) के आसपास घूमीं। कुछ परिवारों ने हाँ कहा, फिर नहीं। 9/11 मेमोरियल की दीवार पर दोनों नाम एक-दूसरे के पास हैं। ड्रू कहते हैं: नाम से फ्रेम नहीं बदलता।

ड्रू ने कहा: तस्वीर मैंने नहीं ली, कैमरे ने ली। सीक्वेंस में एक फ्रेम सीधा बैठा।
क्यों तस्वीर असहज रही
टावर जल रहे थे, यह सबने देखा। एक आदमी का अकेला शरीर नीति को निजी कर देता है। कुछ ने उसे साहस कहा, कुछ ने निंदा — दोनों अनुमान। ऊपर धुआँ था, चुनाव छोटा था। फोटो ने उस छोटे चुनाव को दुनिया के लिविंग रूम में उतार दिया। इसलिए कई घरों ने अखबार उलटा रख दिया।
ड्रू ने उसी दिन और भी फ्रेम काटे। एक मंगेतर AP आए, कपड़े बताए, लैपटॉप पर सीक्वेंस देखा, पहचाना। वह नाम सार्वजनिक बहस का प्रतीक नहीं बना। Falling Man इसलिए टिका कि वह बिना चेहरे के भी चेहरा माँगता है।

अखबारों ने फ्रेम छापा, फिर कई ने हटा दिया। परिवार नाम पर लड़े।
आज सर्च क्या माँगती है
कोई लिखता है Falling Man 2001। कोई Richard Drew। कोई Jonathan Briley। तीनों एक साफ सुबह खोलते हैं जो दोपहर तक धूल हो गई। हम स्काईलाइन और गली देते हैं, गिरता शरीर नहीं।
तस्वीर इसलिए जीवित है कि हम देखना भी चाहते हैं, छिपाना भी। यह पन्ना छिपाता है शरीर को, नहीं छिपाता यह बात कि 11 सितंबर पर कैमरा भी वहाँ था — और कुछ परिवार आज भी उस एक फ्रेम को अपने घर का नहीं मानते।