14 मार्च 1951 को अल्बर्ट आइंस्टाइन 72 साल के हुए। प्रिंसटन में पार्टी खत्म हुई, कार का दरवाज़ा खुला, फ्लैशबल्ब जले। फोटोग्राफर मुस्कान माँग रहे थे। आइंस्टाइन ने जीभ निकाल दी। Einstein tongue photo 1951 उसी एक सेकंड की है। लेने वाले थे UPI / International News के Arthur Sasse।
मूल फ्रेम चौड़ा था। कार की पिछली सीट पर आइंस्टाइन अकेले नहीं थे। साथ में Institute for Advanced Study के Frank Aydelotte और उनकी पत्नी Marie बैठे थे। अखबारों में जो चेहरा चला, वह क्रॉप था — सिर्फ सफेद बाल, मूँछ और जीभ। आइंस्टाइन ने वही क्रॉप पसंद किया।
आइंस्टाइन जीभ निकाले तस्वीर कैसे बनी
पूरी शाम कैमरे पीछा कर रहे थे। एक और स्माइल, एक और पोज। सासे ने आखिरी शॉट माँगा। थके वैज्ञानिक ने मज़ाक में चेहरा बिगाड़ दिया। कई संपादकों को फ्रेम बेअदब लगा। छपा इसलिए कि आइंस्टाइन खुद उस पर हँसे। उन्होंने प्रिंट मँगवाए, दोस्तों को भेजे, ग्रीटिंग कार्ड बनवाए।
एक कॉपी पर जर्मन में लिखा: यह इशारा पूरी इंसानियत की तरफ है, डिप्लोमैट ऐसा नहीं कर सकता। दूसरी कॉपी पर लिखा कि निकली जीभ उनकी राजनीति दिखाती है। 1951 का अमेरिका मैकार्थीवाद के साये में था। आइंस्टाइन शांति और नागरिक स्वतंत्रता पर बोल चुके थे। जीभ सिर्फ जोक नहीं थी, अवज्ञा भी थी।
तस्वीर ने नोबेल वाले गुरु को “नटी प्रोफेसर” बना दिया। सापेक्षता की समीकरण पीछे रह गई, पोस्टर आगे आ गया। लोग E=mc² से पहले जीभ पहचानते हैं। यही कारण है कि सर्च आज भी उसी फसल पर रुकती है।

नोबेल विजेता की छवि बाद में जीभ वाली तस्वीर ने बदल दी।
जो फ्रेम वायरल है वह पूरा नेगेटिव नहीं
सासे का पूरा शॉट कार के अंदर का ग्रुप है। मशहूर वाला चेहरे तक कटा है। विकीमीडिया पर जो फाइल घूमती है, वह अखबार वाली फसल है। चौड़ा फ्रेम अलग अधिकार की चर्चा में रहता है। हमारी इमेज उस क्रॉप की नकल नहीं हैं। वे उसी रात की दुनिया दिखाती हैं — प्रिंसटन की ईंट, फ्लैश, कार की खिड़की।
आइंस्टाइन की पत्नी एल्सा 1936 में गुज़र चुकी थीं। कुछ लेखों में उन्हें 1951 की कार में बैठा दिया जाता है। वह गलत है। साथ वाले आयडेलॉट दंपति थे। छोटी सी गलती भी मिथक को मोटा कर देती है।

आर्थर सासे का फ्रेम कार में बना — मूल शॉट में साथ बैठे और भी लोग थे।
वैज्ञानिक ने तस्वीर क्यों रख ली
गंभीर आदमी की छवि उन पर भारी थी। जीभ ने बोझ हल्का किया। उन्होंने खुद को उस फ्रेम में पहचाना — जिज्ञासु, अवज्ञाकारी, कैमरे का नौकर नहीं। Walter Isaacson की जीवनी भी यही कहती है: उनकी ताकत जिद और जिज्ञासा थी, तसवीरें नहीं।
चार साल बाद, 1955 में, आइंस्टाइन चल बसे। जीभ वाली तस्वीर पीछे रह गई और आगे बढ़ती रही। मग, टी-शर्ट, मीम। हर जन्मदिन 14 मार्च को वही सर्च उठती है। लोग पूछते हैं फोटो असली है या नहीं। असली है। पोज मांगने वाले कैमरे थे। जवाब उनका था।
Einstein sticking tongue out इसलिए टिकी है क्योंकि वह प्रतिभा को इंसान दिखाती है। समीकरण दीवार पर रह सकती है। जीभ दरवाज़े पर रुक जाती है।