23 फरवरी 1945 की दोपहर माउंट सुरीबाची काली राख और धुएँ से ढकी थी। द्वीप इवो जीमा चार दिन पहले ही लैंडिंग देख चुका था। फिर भी दुनिया ने उस दिन एक झंडा याद रखा। Raising the Flag on Iwo Jima Associated Press के Joe Rosenthal की तस्वीर है। Pulitzer 1945 में इसी फ्रेम को मिला। कम लोग जानते हैं कि वह उस सुबह का पहला झंडा नहीं था।
पहली झंडी छोटी थी। लेफ्टिनेंट Harold Schrier की गश्ती ने सुरीबाची की चोटी सुबह ली और उसे गाड़ा। Leatherneck मैगज़ीन के सार्जेंट Louis R. Lowery ने वह पहला पल लिया। जहाज़ों से झंडा कम दिखता था। दोपहर को बड़ी झंडी भेजी गई — करीब 56 बाई 96 इंच, LST-779 से आई बताई जाती है। रोसेंथल उसी दूसरी चढ़ाई पर पहुँचे।
इवो जीमा फ्लैग रेज़िंग 1945 दो बार हुई
लड़ाई 19 फरवरी 1945 को शुरू हुई। 36 दिन चली। सुरीबाची द्वीप का सिरा है, पूरा द्वीप नहीं। झंडा लगने के बाद भी सुरंगें, गुफाएँ और गोली चलती रही। तीन हफ़्ते बाद भी द्वीप “जीता हुआ” नहीं कहा जा सकता था। तस्वीर विजय की मुहर लगती है। मैदान वैसा साफ नहीं था।
रोसेंथल को बाद में पूछा गया कि क्या उन्होंने पोज करवाई। उन्होंने कहा — झंडा चढ़ते देखा, कैमरा उठाया, व्यूफाइंडर तक नहीं देखा। Speed Graphic से एक फ्रेम निकला। उसी पल मरीन सिनेमैटोग्राफर Bill Genaust ने रंगीन फिल्म भी काटी। दोनों कोण लगभग एक जैसे हैं। इसलिए “स्टेज्ड” का आरोप बार-बार आता है, और हर बार वही जवाब आता है: दूसरी झंडी जानबूझकर बड़ी थी, फ्रेम नकली युद्ध नहीं था।
रोसेंथल को लगा वे चूक गए। उन्होंने मरीनों का ग्रुप शॉट लिया जिसे बाद में “Gung Ho” कहा गया। वायरल वह नहीं हुआ। वायरल वह अस्पष्ट छह शरीर वाला फ्रेम हुआ जिसमें चेहरे लगभग गायब हैं। पाठ्यपुस्तक कहती है अच्छे फोटो में चेहरा चाहिए। इस फोटो ने उलटा Sabit किया — बिना चेहरे के राष्ट्र बन सकता है।

झंडा लग चुका था, द्वीप अभी भी मरा नहीं था।
फ्रेम में कौन था — तीन बार नाम बदले गए
शुरू में नाम इस तरह चले: Michael Strank, Franklin Sousley, Ira Hayes, Rene Gagnon, John Bradley और Henry Hansen। 1947 में मरीन कॉर्प्स ने Hansen की जगह Harlon Block लिखा। Block उसी लड़ाई में मारे गए थे। परिवार सालों तक लड़ता रहा।
2016 में बोर्ड ने Navy कॉर्प्समैन John Bradley को हटाया। उनकी जगह Harold Schultz आए। 2019 में Rene Gagnon की जगह Harold Keller आए। आज आधिकारिक छह नाम ये हैं: Harlon Block, Harold Keller, Franklin Sousley, Michael Strank, Harold Schultz, Ira Hayes।
इनमें से Strank, Sousley और Block इवो जीमा पर बाद में काम आए। Hayes घर लौटे और तस्वीर का बोझ ढोते रहे। Bradley और Gagnon दशकों तक “फ्लैग रेज़र” कहे गए, फिर रिकॉर्ड से निकले। यह फेरबदल तस्वीर को झूठा नहीं बनाता। यह बताता है कि एक सेकंड के फ्रेम में शरीर कितने आसानी से गलत नाम पा लेते हैं।

जो रोसेंथल की Pulitzer तस्वीर दूसरी, बड़ी झंडी की थी — पहली सुबह चढ़ चुकी थी।
तस्वीर ने युद्ध को पैसा और प्रतिमा दी
अमेरिका में Seventh War Loan ड्राइव चली। इवो जीमा के जीवित चेहरों को दौरे पर भेजा गया। अनुमान है कि अभियान ने अरबों डॉलर के बॉन्ड बेचे। बाद में उसी मुद्रा को वाशिंगटन के Marine Corps War Memorial में कांस्य कर दिया गया। पत्थर और धातु ने एक दोपहर को हमेशा के लिए रोक दिया।
भारत में यह फ्रेम अक्सर “जीत की तस्वीर” के साथ आता है। ठीक वाक्य यह है: यह चोटी की तस्वीर है, पूरे द्वीप की नहीं। जापानी सैनिक भी उसी काली राख में थे। दोनों तरफ़ के मरे हुए आंकड़े भारी हैं। फोटो एक झंडे को उठाती है, हिसाब को नहीं।
हमारी इमेज रोसेंथल वाले छह-आदमी के प्रसिद्ध सिल्हूट की नकल नहीं हैं। वे उसी पहाड़ी, उसी तारीख, उसी काली ढलान की दुनिया दिखाती हैं। दावा यह नहीं कि यह AP का मूल नेगेटिव है।
आज सर्च में क्या लिखा जाता है
कोई लिखता है Iwo Jima flag raising 1945। कोई लिखता है Joe Rosenthal। कोई लिखता है पहले और दूसरे झंडे का फर्क। तीनों एक ही 23 फरवरी खोलते हैं।
सुरीबाची अब शांत है। स्मारक खड़े हैं। नामों की सूची संशोधित हो चुकी है। फ्रेम वैसा ही है — हवा में झंडा, राख पर जूते, आकाश सख्त। Raising the Flag on Iwo Jima इसलिए टिकी है क्योंकि वह लड़ाई खत्म होने से पहले ही विजय जैसी दिख गई। इतिहास ने बाद में कहा: प्रतीक जल्दी आ गया, द्वीप देर से।