पितृ पक्ष 2026 तारीख चार्ट: जानें 16 श्राद्ध तिथियां

पितृ पक्ष 2026 तारीख चार्ट: जानें 16 श्राद्ध तिथियां

सुबह की हल्की धूप में पीतल के लोटे से काले तिल मिला जल जब हाथों की अंजुली से नीचे गिरता है, तो मन में कोई डर नहीं बल्कि अपने पुरखों के प्रति गहरा आदर होता है। पितृ पक्ष किसी अनहोनी का साया नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को याद करने का सरल पारिवारिक पर्व है।

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पितृ पक्ष क्या है और साल में 16 तिथियों का महत्व क्यों है?

भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का समय हमारे सनातन समाज में पूर्वजों के स्मरण के लिए समर्पित होता है। इसे हम महालय या पितृ पक्ष 2026 के नाम से जानते हैं। बहुत से लोग सोचते हैं कि यह कोई उदासी या डर का पखवाड़ा है, जबकि असल में यह परिवार के उन बुजुर्गों को धन्यवाद कहने का अवसर है जो आज सशरीर हमारे बीच नहीं हैं। इससे जुड़ी जानकारी के लिए पितृपक्ष: पूर्वजों का आशीर्वाद पाने का महापर्व – महत्व, विधि और कथा भी पढ़ें।

हमारे शास्त्रों में मानव जीवन के तीन मुख्य ऋण बताए गए हैं—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। जिस तरह हम माता-पिता की सेवा करते हैं, उसी तरह उनके जाने के बाद उनका आदरपूर्वक स्मरण करना पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है। पूरे पखवाड़े में कुल 16 तिथियां होती हैं, जिनमें पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक हर उस दिन का श्राद्ध किया जाता है जिस तिथि पर किसी परिजन का देहावसान हुआ हो।

यह समय किसी आडंबर या भारी-भरकम खर्च का नहीं है। हमारे छोटे शहरों और गांवों में आज भी इसे बेहद सादगी से मनाया जाता है। केवल एक लोटा शुद्ध जल, थोड़े से काले तिल और मन में सच्ची कृतज्ञता ही पूर्वजों तक आपकी भावना पहुंचाने के लिए काफी मानी जाती है।

पितृ पक्ष 2026 संपूर्ण तारीख चार्ट (26 सितंबर से 10 अक्टूबर)

सामान्य उत्तर भारतीय पंचांग और द्रिक पंचांग गणना के अनुसार वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध के साथ होगी और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर होगा। यह ध्यान रखें कि अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथियां एक दिन आगे-पीछे सरक सकती हैं।

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तारीख दिन श्राद्ध तिथि
26 सितंबर 2026 शनिवार पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर 2026 रविवार प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर 2026 सोमवार द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर 2026 मंगलवार तृतीया श्राद्ध
30 सितंबर 2026 बुधवार चतुर्थी श्राद्ध
01 अक्टूबर 2026 गुरुवार पंचमी श्राद्ध
02 अक्टूबर 2026 शुक्रवार षष्ठी श्राद्ध
03 अक्टूबर 2026 शनिवार सप्तमी श्राद्ध
04 अक्टूबर 2026 रविवार अष्टमी श्राद्ध
05 अक्टूबर 2026 सोमवार नवमी श्राद्ध (मातृ नवमी)
06 अक्टूबर 2026 मंगलवार दशमी श्राद्ध
07 अक्टूबर 2026 बुधवार एकादशी श्राद्ध
08 अक्टूबर 2026 गुरुवार द्वादशी श्राद्ध
09 अक्टूबर 2026 शुक्रवार त्रयोदशी / चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर 2026 शनिवार सर्वपितृ अमावस्या (महालय)

इस सारणी को देखकर आप अपने परिवार के दिवंगत सदस्यों की तिथि के अनुसार सही दिन का चुनाव कर सकते हैं। यदि किसी परिजन की मृत्यु की निश्चित तिथि याद न हो, तो उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या का दिन सबसे उत्तम माना गया है।

घर पर तर्पण का सरल और प्रामाणिक क्रम

तर्पण करने के लिए किसी बड़े तीर्थ स्थल पर जाना ही अनिवार्य नहीं है। यदि आप घर पर हैं, तो भी बड़ी सरलता और पवित्रता के साथ अपने पितरों को जल अर्पित कर सकते हैं। इसके लिए बस कुछ बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती है जो हर घर में आसानी से उपलब्ध होती हैं।

घर के आंगन, बालकनी या छत पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक साफ तांबे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल लें। उसमें थोड़ा सा कच्चा गाय का दूध, काले तिल और यदि संभव हो तो एक कुशा (दूर्वा घास) रख लें। अपने दाएं हाथ की अनामिका उंगली में कुशा की पवित्री (अंगूठी) पहनना पारंपरिक माना जाता है।

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हाथ की अंजुली में जल लेकर अंगूठे और तर्जनी के बीच वाले भाग (पितृतीर्थ) से जल को किसी बड़े पात्र में धीरे-धीरे गिराएं। इस दौरान अपने मन में पिता, दादा, परदादा या दिवंगत परिजनों का नाम और गोत्र याद करते हुए कहें कि यह जल आपको तृप्त करे। यह प्रक्रिया शांत मन से तीन बार दोहराई जाती है।

पीतल के लोटे से कुश और काले तिल मिला जल गिरते हुए तर्पण की विधि
पीतल के लोटे और कुश से जल अर्पण करने की सरल तर्पण विधि

श्राद्ध का भोजन और पंचबली का असली महत्व

श्राद्ध के दिन घर में सात्विक भोजन पकाने की परंपरा है। इसमें आमतौर पर पूरी, उड़द की दाल की कढ़ी या सादी दाल, मौसमी सब्जी (जैसे लौकी या तोरई) और विशेष रूप से दूध की खीर बनाई जाती है। इस भोजन में लहसुन, प्याज, बैंगन या हींग का प्रयोग नहीं किया जाता।

भोजन तैयार होने के बाद सीधे ब्राह्मण या स्वयं खाने से पहले ‘पंचबली’ निकालने का नियम है। इसका अर्थ होता है सृष्टि के पांच अलग-अलग जीवों के लिए भोजन का अंश निकालना। एक पत्तल या थाली पर भोजन के पांच छोटे भाग रखे जाते हैं:

  • गोबली: गाय के लिए निकाला गया ग्रास।
  • श्वानबली: कुत्ते के लिए निकाला गया भाग।
  • काकबली: कौवे के लिए छत पर रखा जाने वाला अंश।
  • देवादिबली: देवताओं और चींटियों के लिए जमीन पर रखा गया अन्न।
  • पिपीलिकादिबली: कीट-पतंगों और अन्य सूक्ष्म जीवों के लिए भोजन।

यह पंचबली केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे कृतज्ञता भाव को दर्शाती है कि हमारा अस्तित्व केवल इंसानों से नहीं बल्कि इन सभी जीवों से जुड़ा है। इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण, जरूरतमंद व्यक्ति या भांजे-दामाद को आदरपूर्वक भोजन कराएं।

पीतल की थाली में खीर काले तिल चमेली के फूल और जलता हुआ मिट्टी का दीया
श्राद्ध के लिए खीर, तिल और दीये से सजी सात्विक थाली
FACT: महाभारत के अनुसार दानवीर कर्ण की आत्मा जब परलोक पहुंची तो उन्हें खाने में सोना-चांदी दिया गया। तब यमराज ने बताया कि उन्होंने अन्न और जल का तर्पण कभी नहीं किया था, जिसके बाद उन्हें 16 दिन पृथ्वी पर आकर तर्पण करने की अनुमति मिली।

सर्वपितृ अमावस्या 2026: जब तिथि याद न हो तो क्या करें?

पितृ पक्ष का अंतिम दिन यानी आश्विन अमावस्या को ‘सर्वपितृ अमावस्या’ या ‘महालय विसर्जन’ कहा जाता है। यह दिन उन सभी लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जिन्हें अपने माता-पिता या दादा-दादी की देहावसान तिथि ठीक से याद नहीं रहती या किसी कारणवश वे निश्चित तिथि पर श्राद्ध करने से चूक गए हों।

मान्यता है कि अमावस्या के दिन सभी पितृ अपने लोक लौटने से पहले अपने वंशजों के द्वार पर आते हैं। इसलिए इस दिन किया गया तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन उन सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों तक सीधे पहुंच जाता है। यदि परिवार में अकाल मृत्यु हुई हो या किसी का अंतिम संस्कार ठीक से न हो पाया हो, तो भी सर्वपितृ अमावस्या पर विशेष प्रार्थना और दान करने का विधान है।

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, पूर्वजों के नाम से तिल-जल का तर्पण करें और दोपहर के समय खीर-पूरी का भोजन बनाकर जरूरतमंदों को खिलाएं। शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर एक तेल या घी का दीपक जलाकर रखना चाहिए, जिसे पितरों की विदाई का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना जाता है।

पितृ पक्ष में क्या न करें: फिल्मी डर और अंधविश्वास से बचें

अक्सर सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर पितृ पक्ष को लेकर कई तरह के डरावने दावे किए जाते हैं, जैसे ‘इस दौरान बाल कटवाने से अनिष्ट हो जाएगा’ या ‘कोई नया काम शुरू किया तो कुल नष्ट हो जाएगा’। यह पूरी तरह से भ्रामक और गलत समझ है। हमारे ऋषि-मुनियों ने कभी भी श्रद्धा के पर्व को डर का साधन नहीं बनाया।

पितृ पक्ष कोई अपशकुन का काल नहीं है। यह केवल एक ऐसा पखवाड़ा है जब आपको अपने सांसारिक उत्सवों, जश्न और नई खरीदारी की भागदौड़ से थोड़ा रुककर अपने पूर्वजों के त्याग को याद करने की सलाह दी जाती है। सादगी बरतने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सामान्य जीवन रुक जाए।

इस दौरान तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, नशा), घर में कलह, बुजुर्गों का अनादर और किसी असहाय जीव को सताना वर्जित माना गया है। यदि आप अपने जीवित माता-पिता को दुखी रखते हैं और श्राद्ध में हजारों रुपये खर्च करते हैं, तो उस श्राद्ध का कोई फल नहीं मिलता। सच्ची सेवा ही असली तर्पण है।

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जब भी पितृ पक्ष आता है, कई लोग इसे भारी मन और तरह-तरह के वहम के साथ देखने लगते हैं। किसी ने कह दिया कि नया कपड़ा नहीं खरीदना, तो किसी ने डरा दिया कि गाड़ी ली तो पितृ नाराज हो जाएंगे। अपने पुरखों को कभी ऐसा क्रूर मत समझिए जो आपकी तरक्की देखकर नाराज हो जाएं। वे तो वही माता-पिता और दादा-दादी हैं जिन्होंने जीते-जी अपने हिस्से की रोटी आपको खिला दी थी।

रामायण में एक बेहद सुंदर प्रसंग आता है जब भगवान श्री राम वनवास के दौरान राजा दशरथ का श्राद्ध करने के लिए फल्गु नदी के तट पर बैठते हैं। उस समय उनके पास न कोई सोने-चांदी के बर्तन थे और न ही छप्पन भोग। माता सीता ने बालू के पिंड बनाकर और फल्गु के जल से ही पूरी श्रद्धा के साथ दशरथ जी का तर्पण किया था। दशरथ जी की आत्मा ने उसी सादे बालू के पिंड को सहर्ष स्वीकार किया क्योंकि उसमें अटूट श्रद्धा और प्रेम था।

💡 पुरखों को आपकी महंगी थाली नहीं, मन की शांति और परिवार का आपसी प्रेम चाहिए।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अगर आपके पास बहुत समय या पंडित जी की व्यवस्था नहीं है, तो बिल्कुल परेशान मत होइए। छत पर खड़े होकर दक्षिण दिशा में एक लोटा जल काले तिल के साथ अर्पित कर दीजिए और हाथ जोड़कर कहिए कि हे पूर्वजों, मुझसे जो बन पड़ा मैंने श्रद्धा से किया, इसे स्वीकार करें। सबसे बड़ा श्राद्ध यह है कि घर के जीवित बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान रहे और भाई-भाई में प्रेम बना रहे।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

यदि पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो तो श्राद्ध किस दिन करना चाहिए?

यदि परिजनों की निश्चित तिथि याद न हो, तो आश्विन मास की सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए। इस दिन किया गया श्राद्ध सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों तक पहुंचता है।

क्या महिलाएं भी घर पर पितरों का तर्पण या श्राद्ध कर सकती हैं?

हाँ, गरुड़ पुराण और वाल्मीकि रामायण के अनुसार यदि परिवार में कोई पुरुष सदस्य न हो या उपलब्ध न हो, तो कन्या या पत्नी भी पूरे विधि-विधान और शुद्ध भाव से तर्पण कर सकती हैं।

पितृ पक्ष में तर्पण करने का सबसे सही समय क्या माना जाता है?

तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर का कुतुप और रौहिण मुहूर्त सबसे उत्तम माना जाता है, जो सामान्यतः सुबह 11:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे के बीच होता है।

क्या श्राद्ध में काले तिल का उपयोग करना अनिवार्य है?

हाँ, सनातन परंपरा में तिल को भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न और अत्यंत पवित्र माना गया है। तिल नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है और जल को पितरों के ग्रहण योग्य बनाता है।

Disclaimer: इस article में दी गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता के लिए है।

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Vivek Hardaha Written by: Writer, YouTuber and tool builder · Madhya Pradesh

Vivek has been online since 2012 and has worked since 2014 across YouTube, blogs and news platforms. He holds an M.Sc. in Computer Science and an M.A. in Sociology. On Vista Hub he writes practical, plain-language guides on tech, money, health, farming and festivals.

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