हर साल आश्विन के महीने में जब ढाक की गूंज और अगरबत्ती की महक हवा में घुलती है, तो हम पंडालों में मां की मिट्टी की सजीव प्रतिमा देखकर हाथ जोड़ लेते हैं। पर क्या कभी आपने सोचा है कि मां की यह विशाल मूर्ति बैठाने का सिलसिला कब, कहां और क्यों शुरू हुआ?
आस्था बनाम इतिहास: कितने साल पुरानी है दुर्गा मूर्ति स्थापना की परंपरा?
जब हम दुर्गा मूर्ति स्थापना के इतिहास की बात करते हैं, तो हमें दो अलग-अलग धाराओं को समझना होगा—एक है पौराणिक काल और दूसरा है दर्ज ऐतिहासिक काल। धार्मिक दृष्टिकोण से मां दुर्गा की उपासना सतयुग और त्रेतायुग से जुड़ी है, लेकिन आज जिस तरह हम मोहल्लों और बड़े-बड़े पंडालों में मिट्टी की भव्य प्रतिमा स्थापित करते हैं, उसका लिखित प्रमाण लगभग 500 से अधिक वर्ष पुराना है।
प्राचीन भारत में देवी की साधना मुख्य रूप से तांत्रिक यंत्रों, कलश स्थापना, या फिर स्थायी पाषाण और धातु के विग्रहों के माध्यम से की जाती थी। हर साल मिट्टी से विशाल प्रतिमा बनाकर, नौ दिन प्राण प्रतिष्ठा कर फिर उसे जल में विसर्जित करने का रिवाज धीरे-धीरे बंगाल और पूर्वी भारत के रजवाड़ों के संरक्षण में विकसित हुआ। 16वीं शताब्दी से पहले यह उत्सव मुख्य रूप से घरों के भीतर या गुप्त तांत्रिक साधना के रूप में अधिक प्रचलित था।

पौराणिक जड़ें: मार्कंडेय पुराण और देवी महात्म्य का संदेश
मूर्ति पूजा का दार्शनिक आधार हजारों साल पुराने मार्कंडेय पुराण और उसके सुप्रसिद्ध अंश ‘दुर्गा सप्तशती’ (देवी महात्म्य) में मिलता है। इस ग्रंथ में विस्तार से वर्णन है कि कैसे देवताओं के सामूहिक तेज से मां भगवती का प्राकट्य हुआ और उन्होंने महिषासुर का संहार किया।
इसी ग्रंथ में राजा सुरथ और समाधि वैश्य की कथा भी आती है, जिन्होंने अपने खोए हुए राज्य और मानसिक शांति को पाने के लिए नदी तट पर मिट्टी से देवी की मूर्ति बनाई थी और तपस्या की थी। यह कथा दर्शाती है कि मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजने की आध्यात्मिक अवधारणा हमारे शास्त्रों में हजारों साल पहले से मौजूद थी, भले ही तब यह सामाजिक उत्सव न होकर व्यक्तिगत तपस्या का मार्ग हुआ करती थी।
16वीं शताब्दी: बंगाल के राजाओं और जमींदारों की पहली भव्य पूजा
इतिहासकारों के अनुसार, भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर शरद ऋतु में दुर्गा पूजा कराने का श्रेय 16वीं शताब्दी के राजाओं को जाता है। लगभग 1583 के आसपास ताहिरपुर के राजा कंसनारायण (या कुछ अभिलेखों में मालदह व नदिया के राजाओं) ने बहुत बड़े स्तर पर मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण करवाकर पूरे राज्य के लिए उत्सव का आयोजन किया था।
उस समय इन राजपरिवारों ने कारीगरों, मूर्तिकारों और पुरोहितों को संगठित किया। राजबाड़ियों (राजमहलों के आंगनों) में ‘ठाकुर दालान’ बनाए गए, जहां परिवार और प्रजा मिलकर देवी के दर्शन करते थे। यहीं से मिट्टी की सपरिवार प्रतिमा—जिसमें मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश जी भी होते हैं—का एक निश्चित ढांचा तैयार हुआ जिसे ‘एकचाला’ कहा जाने लगा।

शोभाबाजार राजबारी और 18वीं सदी का सामाजिक बदलाव
18वीं सदी के मध्य में दुर्गा पूजा का स्वरूप एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक मंच के रूप में उभरने लगा। 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद, कोलकाता के शोभाबाजार में नवकृष्ण देब ने एक अत्यंत भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन किया था। इस आयोजन ने कोलकाता के कुलीन वर्ग में एक नई होड़ शुरू कर दी।
उस दौर में दुर्गा मूर्ति स्थापना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और कला का सबसे बड़ा प्रदर्शन बन गई। कुम्हारटोली के कारीगरों को गंगा की पावन मिट्टी से बारीक नक्काशीदार प्रतिमाएं गढ़ने का काम मिलने लगा। अमीर जमींदार अपनी हवेलियों के दरवाजे आम जनता के लिए खोल देते थे, जिससे भक्ति के साथ-साथ लोक-संस्कृति का अभूतपूर्व संगम हुआ।
बारोयारी से सार्वजनीन: जब पंडाल आम जनता के हाथों में आया
18वीं सदी के अंत तक दुर्गा पूजा मुख्य रूप से राजाओं और धनी जमींदारों की चारदीवारी तक सीमित थी। लेकिन 1790 में हुगली के गुप्तीपारा में 12 मित्रों ने मिलकर जनता से चंदा जुटाकर पहली ‘बारोयारी’ (बारह यार या बारह मित्रों की) पूजा शुरू की। इसने पूजा को राजमहलों से निकालकर खुले मैदान में ला खड़ा किया।
इसके बाद 1910 में कोलकाता के बलराम बसु घाट रोड पर पहली पूर्ण रूप से ‘सार्वजनीन दुर्गा पूजा’ का गठन हुआ। अब मूर्ति स्थापना किसी एक राजा के पैसे पर नहीं, बल्कि समाज के हर तबके के सामूहिक सहयोग से होने लगी। यह वह मोड़ था जिसने आज के आधुनिक पंडाल कल्चर की नींव रखी, जहां हर जाति और वर्ग का व्यक्ति मां के सामने एक समान खड़ा होता है।
उत्तर भारत और देश के अन्य हिस्सों में मूर्ति स्थापना का विस्तार
बंगाल से निकला यह स्वरूप 20वीं सदी के मध्य तक पूरे उत्तर और मध्य भारत में भी तेजी से लोकप्रिय हुआ। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में पहले नवरात्रि के दौरान केवल रामलीला मंचन और घरों में कलश स्थापना हुआ करती थी। लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के समय और उसके बाद, सांस्कृतिक एकीकरण के तहत विभिन्न शहरों में मां दुर्गा के सार्वजनिक पंडाल लगने लगे।
आज लखनऊ, वाराणसी, इंदौर, पटना और दिल्ली जैसे शहरों में भी भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। स्थानीय मूर्तिकार अपनी-अपनी क्षेत्रीय शैलियों में मां शेरावाली के नौ रूपों और महिषासुरमर्दिनी स्वरूप को जीवंत करते हैं। 500 वर्षों का यह सफर दर्शाता है कि कैसे एक क्षेत्रीय राजसी परंपरा पूरे राष्ट्र के साझा जन-उत्सव में बदल गई।
मूर्ति के सामने शीश नवाने से पहले हमें यह गहराई से समझना चाहिए कि मिट्टी का यह विग्रह वास्तव में किस चेतना का प्रतीक है। शास्त्रों में मिट्टी को पंचतत्वों की जननी कहा गया है, और जब हम उसी मिट्टी से मां का रूप गढ़ते हैं, तो वह इस नश्वर संसार में सर्वोच्च शक्ति के साकार होने का प्रमाण बन जाता है। राजा सुरथ ने जब सब कुछ खो दिया था, तब उन्होंने भी मिट्टी की प्रतिमा में ही उस असीम ऊर्जा को महसूस किया था जिसने उनका खोया हुआ विवेक और गौरव लौटा दिया।
नवरात्रि का यह पावन पर्व हमें बाहरी तड़क-भड़क से आगे बढ़कर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। आज जब हम विशाल पंडालों और आकर्षक रोशनी के बीच खड़े होते हैं, तो कई बार पूजा का मूल भाव शोर में खो जाता है। वास्तविक साधना प्रतिमा की भव्यता में नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और मां के प्रति समर्पित भाव में बसती है।
आस्था का अर्थ अंधानुकरण या दिखावा कभी नहीं रहा। जब भी आप इस नवरात्रि मां के दर्शन करें, तो उनसे केवल सांसारिक वस्तुएं मांगने के बजाय सद्बुद्धि और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का साहस मांगें। परंपराओं का सम्मान करें, उत्सव का आनंद लें, लेकिन पंडालों में मर्यादा और स्वच्छता का ध्यान रखकर अपनी श्रद्धा को सच्चा अर्थ दें।
भारत में दुर्गा पूजा में मूर्ति स्थापना की शुरुआत सबसे पहले कहां हुई थी?
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार बड़े पैमाने पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापना की शुरुआत 16वीं शताब्दी में बंगाल के राजघरानों, विशेषकर ताहिरपुर और नदिया के राजाओं के संरक्षण में हुई थी।
क्या प्राचीन काल में भी नवरात्रि पर ऐसी ही मूर्तियां बनती थीं?
प्राचीन काल में ज्यादातर उपासना कलश स्थापना, यंत्र पूजा या मंदिरों में स्थापित स्थायी पाषाण प्रतिमाओं द्वारा होती थी। अस्थायी मिट्टी की मूर्तियों का बड़े स्तर पर निर्माण मध्यकाल में शुरू हुआ।
दुर्गा पूजा को सार्वजनीन या सार्वजनिक रूप कब मिला?
18वीं सदी के अंत में हुगली के गुप्तीपारा से ‘बारोयारी’ पूजा शुरू हुई और 1910 में कोलकाता में पहली पूर्ण सार्वजनिक दुर्गा पूजा आयोजित की गई, जिससे यह आम जनता का पर्व बना।
दुर्गा प्रतिमा में मां के साथ अन्य कौन से देवी-देवता होते हैं?
पारंपरिक ‘एकचाला’ प्रतिमा में मां दुर्गा के साथ देवी लक्ष्मी (समृद्धि), देवी सरस्वती (ज्ञान), भगवान गणेश (सिद्धि) और भगवान कार्तिकेय (शौर्य) सपरिवार विराजमान रहते हैं।