बचपन में दो बिल्लियों और एक समझदार बंदर वाली कहानी तो सबने सुनी होगी, जहाँ रोटी एक थी, झगड़ा दो के बीच हुआ और मलाई तीसरा खा गया। फूट डालो और राज करो का पूरा विज्ञान बस इसी एक घटना में समाया हुआ है, जो सदियों पहले भी काम करता था और आज भी बिल्कुल वैसा ही चल रहा है।
फूट डालो और शासन करो की नीति का असल मतलब क्या है?
अगर बिल्कुल सीधी और देसी भाषा में कहें, तो फूट डालो और राज करो एक ऐसी साइकोलॉजिकल चाल है जिसमें एक ताकतवर इंसान या सत्ता दो आपस में जुड़े लोगों, समुदायों या गुटों के बीच शक का बीज बो देती है। जब दोनों पक्ष आपस में लड़ने में व्यस्त हो जाते हैं, तब तीसरा इंसान बिना किसी बड़ी मेहनत के दोनों पर अपना कंट्रोल बना लेता है।
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी बड़ी आबादी पर मुट्ठी भर लोगों को हुकूमत करनी होती है, तो वे कभी सीधे युद्ध नहीं लड़ते। वे बस यह देखते हैं कि सामने वालों में अंदरूनी कमजोरी क्या है — धर्म, जात, भाषा, या फिर आपसी जलन। बस उस दुखती रग पर थोड़ा सा नमक छिड़क दो, और बाकी का काम लोग खुद एक-दूसरे का सिर फोड़कर कर लेते हैं।
यह नीति सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। यह हमारे घरों के झगड़ों से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिसों की गंदी पॉलिटिक्स तक हर जगह चुपचाप काम करती है। इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि जो लोग आपस में लड़ रहे होते हैं, उन्हें लगता है कि वे अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि असल फायदा किसी तीसरे का हो रहा होता है।

इतिहास का पन्ना: अंग्रेजों ने भारत में इस हथियार को कैसे तराशा?
1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों के पसीने छूट गए थे। उन्हें समझ आ गया था कि अगर हिंदू, मुस्लिम, सिख और देश के तमाम राजे-रजवाड़े एक साथ खड़े हो गए, तो बोरिया-बिस्तर बांधने में देर नहीं लगेगी। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने बाकायदा अपनी डायरी में लिखा कि भारत पर लंबे समय तक टिके रहने का सिर्फ एक ही फॉर्मूला है — आंतरिक विभाजन।
लॉर्ड कर्जन ने जब 1905 में बंगाल का विभाजन किया, तो तर्क दिया गया कि प्रशासनिक सहूलियत के लिए ऐसा किया जा रहा है। मगर पर्दे के पीछे असली मकसद था राष्ट्रवादी आंदोलन की रीढ़ तोड़ना और धर्म के आधार पर दरार पैदा करना। इसके बाद 1909 का ‘मार्ले-मिंटो सुधार’ आया, जिसने अलग चुनाव प्रणाली देकर इस खाई को हमेशा के लिए पक्का कर दिया।
अंग्रेज बहुत चालाक थे। वे एक राजा को दूसरे राजा के खिलाफ भड़काते थे, उन्हें तोपों की सलामी और सुरक्षा का लालच देते थे। नतीजा यह हुआ कि हमारे अपने ही लोग अपने पड़ोसियों को नीचा दिखाने के लिए विदेशी हुकूमत के आगे हाथ जोड़े खड़े हो गए। इतिहास की यह गलती हमें आज भी याद रखनी चाहिए।
गांधी जी का नजरिया और एकता की सबसे बड़ी ताकत
महात्मा गांधी इस बात को बहुत गहराई से समझते थे कि अंग्रेजों की असली ताकत उनकी सेना नहीं, बल्कि भारतीयों का आपस में बंटा होना है। गांधी जी ने बार-बार कहा था कि जिस दिन भारत के लोग आपसी मतभेद भुलाकर एक धागे में बंध जाएंगे, उस दिन अंग्रेजी साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
यही वजह थी कि उन्होंने असहयोग आंदोलन और बाद में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हमेशा सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने स्पष्ट किया था कि स्वराज्य केवल सत्ता बदलने का नाम नहीं है, बल्कि अपने अंदर के भेदों को मिटाकर एक सशक्त समाज बनाने की प्रक्रिया है।
गांधी जी का मानना था कि फूट डालने वाले को दोष देने से पहले हमें अपनी उस कमजोरी को देखना होगा जो हमें किसी तीसरे के बहकावे में आने देती है। जब तक हमारे अंदर नफरत और शक की गुंजाइश रहेगी, तब तक कोई न कोई बाहर वाला आकर उसका फायदा उठाता ही रहेगा।
मॉडर्न युग में फूट डालो और राज करो: ऑफिस से लेकर सोशल मीडिया तक
अब न तो लॉर्ड कर्जन हैं और न ही ईस्ट इंडिया कंपनी, लेकिन यह रणनीति आज और ज्यादा एडवांस हो चुकी है। आज के कॉर्पोरेट कल्चर में आपने अक्सर देखा होगा कि एक खराब मैनेजर अपनी टीम के दो होशियार एम्प्लॉइज को कभी करीब नहीं आने देता। एक के कान में दूसरे की बुराई और दूसरे को पहले की झूठी तारीफ — ताकि दोनों आपस में कॉम्पीट करते रहें और मैनेजर की कुर्सी सलामत रहे।
सोशल मीडिया एल्गोरिदम भी इसी नीति पर काम करते हैं। इंटरनेट पर सबसे ज्यादा एंगेजमेंट गुस्से और नफरत से आता है। जब दो ग्रुप किसी मुद्दे पर ऑनलाइन भिड़ते हैं, तो टेक कंपनियों का स्क्रीन-टाइम बढ़ता है और उनका ऐड रेवेन्यू कई गुना बढ़ जाता है।
स्मार्टफोन की स्क्रीन पर अंगूठा घिसते हुए जब हम किसी अजनबी पर कमेंट सेक्शन में गुस्सा निकाल रहे होते हैं, तब दरअसल हम उसी पुराने ‘डिवाइड एंड रूल’ के मॉडर्न ट्रैप में फंसे होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले तलवारें चलती थीं, अब कीबोर्ड पर उंगलियां चलती हैं।
पुराने और नए दौर की नीतियों में क्या अंतर आया है?
समय बदलने के साथ फूट डालने के तौर-तरीके भी काफी बदल चुके हैं। पहले यह काम खुलेआम दस्तावेजों और संधियों के जरिए होता था, जबकि आज यह अदृश्य तरीके से साइकोलॉजिकल और डिजिटल टूल्स के जरिए अंजाम दिया जाता है।
| पहलू | पुराना दौर (ब्रिटिश काल) | नया दौर (आधुनिक समय) |
|---|---|---|
| मुख्य माध्यम | कानून, रियासतों के झगड़े और संधियां | सोशल मीडिया, फेक नैरेटिव और पीआर कैंपेन |
| मकसद | जमीन और टैक्स पर कब्ज़ा करना | वोट बैंक, डेटा कंट्रोल और बाजार पर एकाधिकार |
| पहचान का तरीका | साफ दिखता था कि कौन तीसरा पक्ष है | तीसरा पक्ष पर्दे के पीछे पूरी तरह अदृश्य रहता है |
इस बदलाव को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि जब तक हम नए दौर के हथियारों को नहीं पहचानेंगे, तब तक हम अनजाने में उसी चक्रव्यूह का शिकार बनते रहेंगे। आज विभाजन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि वैचारिक और मानसिक हो चुका है।
इस ट्रैप से खुद को और समाज को कैसे सुरक्षित रखें?
जब भी आपको किसी बात पर अचानक बहुत तेज गुस्सा आए या किसी अपने के खिलाफ कोई भड़काने वाली खबर मिले, तो तुरंत रिएक्ट करने से बचें। खुद से सिर्फ एक सवाल पूछें — ‘इस झगड़े से असल में फायदा किसका हो रहा है?’ जैसे ही आप यह सोचना शुरू करेंगे, आपको पूरी तस्वीर शीशे की तरह साफ दिखने लगेगी।
किसी भी तीसरे इंसान की बातों पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। अगर किसी दोस्त, सहकर्मी या रिश्तेदार से कोई शिकायत है, तो बीच के बिचौलियों को हटाकर सीधे आमने-सामने बैठकर बात करें। संवाद ही वह एकमात्र कैंची है जो गलतफहमी के धागों को काट सकती है।
समाज के स्तर पर हमें यह समझना होगा कि विविधता हमारी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है। जब हम छोटी-छोटी पहचानों से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करना सीखते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत हमें आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा नहीं कर सकती।
पर्सनल एडवाइस
जिंदगी में एक बात हमेशा याद रखना — जब दो लोग लड़ते हैं, तो जीतने वाला कभी उन दोनों में से कोई एक नहीं होता, बल्कि हमेशा वो तीसरा होता है जो दूर बैठकर तमाशा देख रहा था। चाहे घर का क्लेश हो, ऑफिस की पॉलिटिक्स या इंटरनेट पर छिड़ी कोई बेमतलब की बहस, हर जगह यही थ्योरी चुपचाप अपना काम करती है।
इतिहास में महाभारत के युद्ध से पहले शकुनि ने पांडवों और कौरवों के बीच सिर्फ इसी फूट के बीज को सींचा था। अगर दुर्योधन ने अपने अहंकार और शक के चश्मे को उतारकर सीधे अपने भाइयों से संवाद किया होता, तो कुरुक्षेत्र का वो भयानक विनाश कभी नहीं होता। साइकोलॉजी का भी यही नियम है कि इंसान जब डर और गुस्से में होता है, तो उसका दिमाग लॉजिक सोचना बंद कर देता है।
आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है अपने इमोशनल ट्रिगर्स को कंट्रोल करना। सोशल मीडिया पर जानबूझकर ऐसा कंटेंट परोसा जाता है जिससे आप भड़कें और किसी ग्रुप से नफरत करने लगें। समझदारी इसी में है कि किसी के एजेंडे की कठपुतली मत बनो; दिमाग की डोर अपने हाथ में रखो और हर बात को लॉजिक की कसौटी पर परखो।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
फूट डालो और राज करो की नीति सबसे पहले किसने शुरू की थी?
ऐतिहासिक रूप से यह नीति रोमन साम्राज्य में ‘Divide et Impera’ के नाम से मशहूर थी। बाद में 18वीं और 19वीं सदी में ब्रिटिश हुकूमत ने भारत और अपने अन्य उपनिवेशों पर लंबे समय तक शासन करने के लिए इसे सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।
अंग्रेजों ने भारत में फूट डालने के लिए कौन से मुख्य कदम उठाए थे?
अंग्रेजों ने 1857 के बाद सेना का जातिगत पुनर्गठन किया, 1905 में धर्म के आधार पर बंगाल का विभाजन किया और 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों के जरिए अलग निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) बनाकर समाज में गहरी दरार पैदा की।
आज के समय में हम इस नीति की पहचान कैसे कर सकते हैं?
जब भी कोई व्यक्ति, संस्था या मीडिया नैरेटिव आपको किसी समुदाय या सहकर्मी के खिलाफ बिना ठोस सबूत के भड़काने लगे, तो समझ जाएं कि वहां यही नीति काम कर रही है। हमेशा यह देखें कि उस नफरत से फायदा किसे पहुंच रहा है।
ऑफिस में मैनेजरों द्वारा अपनाई जाने वाली डिवाइड एंड रूल से कैसे निपटें?
ऑफिस में अपने साथियों के साथ ट्रांसपेरेंट और सीधा संवाद रखें। किसी तीसरे की कही बातों पर भरोसा करने के बजाय आपस में तालमेल मजबूत करें और हर जरूरी बातचीत को लिखित (ईमेल) रिकॉर्ड पर रखें।
Disclaimer: इस article में दी गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता के लिए है।