मैया करूँ अम्बे तोरी आरती हो माँ: हिंदी पाठ
माँ को पुकारने, आरती की थाली सजाने और अपनी भूलों की क्षमा माँगने का भाव इस गीत में है। यहाँ “मैया करूँ अम्बे तोरी आरती हो माँ” के दस पद और उनके सरल अर्थ पढ़ें। “मैया करूं अम्बे तुरी आरती हो मां” तथा “मैया करूँ अम्बे तेरी आरती” इसके खोज में लिखे जाने वाले रूप हैं।
पाठ संबंधी जानकारी: दिए गए दुर्गे वाले पाठ के मुखड़े में “अम्बे” रखकर यह अनुकूलित संस्करण तैयार किया गया है। बाकी बोल वैसे ही हैं। किसी विशेष गायक की रिकॉर्डिंग से मिलान नहीं हुआ है।
मैया करूँ अम्बे तोरी आरती हो माँ — पूरे बोल
मैंया करूं अम्बे तोरी आरती हो मां ।
अरे सब पर रहियो सहाय मैया मोरी । 1 ।
अरे कंचन थाल सजा के रे, दिया कपूर जलाएं ।
पांच फूल की बतियां रे, मैया तोरे दरबार । 2 ।
अरे एक हाथ खप्पर लियो रे, दूजे में त्रिशुल ।
तीजे हाथ खाड़ा लिये रे चौथे में धरे फूल । 3 ।
चम्पा-चमेली और केवड़ा रे रघुवंश गुलाब ।
मोंगरन कली छिटकन लगी रे मैया तोरे दरबार । 4 ।
दाहिने हाथ हिंगला लियो रे डेरे में लंगूर ।
मैया तोरी विनती करत हो रे माफ करियो कसूर ।। 5 ।।
चम्पा के फूलत चमेली फूली रे फूले गेंदा और गुलाब ।
आधी रात के खिल रही रे मैया तोरे दरबार ।। 6 ।।
शुंभ निशुंभ दोई दानव रे जोधा बलवान ।
तीन भुवन उन जीतो रे माने न हार ॥ करूं ।। 7 ।।
खुली जोत जगतारन रे सब सुनी है पुकार ।
सकल मनोरथ पूर्ण भयो रे दुख हुए सब दूर ।। 8 ।।
ओ मोरी आदि भवानी रे रख लइयो मोरी लाज ।
सब मिलकर जस गावें रे आये तोरे दरबार ।। 9 ।।
सुमर-सुमर जस गावें रे रहे चरण अपार ।
चरण छोड़ कहां जावे रे आये शरण तुम्हार ।। 10 ।।
आरती का सरल अर्थ — पदवार भावार्थ
पद 1 का अर्थ
भक्त माँ अम्बे की आरती करके सबकी सहायता की प्रार्थना करता है। इसमें केवल अपना नहीं, सामूहिक मंगल का भाव है।
पद 2 का अर्थ
थाली, दीपक, कपूर और फूलों से पूजा सजाने का वर्णन है। भक्त श्रद्धा के साथ माँ के दरबार में उपस्थित होता है।
पद 3 का अर्थ
देवी के आयुध और फूल शक्ति तथा कोमलता का भाव दिखाते हैं। “खाड़ा” स्थानीय पाठ का शब्द है; निश्चित अर्थ नहीं जोड़ा गया।
पद 4 का अर्थ
फूलों और कलियों से दरबार की शोभा बताई गई है। स्थानीय नाम बदल सकते हैं; यह भावार्थ है, वनस्पति पहचान नहीं।
पद 5 का अर्थ
भक्त अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगता है। “हिंगला” और “डेरे” अस्पष्ट हैं; रिकॉर्डिंग से मिलान बिना अनुमानित अर्थ नहीं दिया गया।
पद 6 का अर्थ
फूलों से भक्ति का वातावरण बताया गया है। इसे काव्यात्मक वर्णन समझें, सभी फूल आधी रात में खिलने का वैज्ञानिक दावा नहीं।
पद 7 का अर्थ
शुंभ-निशुंभ के बल का उल्लेख देवी की महिमा के संदर्भ में है। इस पद को धार्मिक कथा और स्तुति की तरह पढ़ें।
पद 8 का अर्थ
पुकार सुने जाने और दुख दूर होने का विश्वास व्यक्त है। ये श्रद्धा के कथन हैं, निश्चित परिणाम का वादा नहीं।
पद 9 का अर्थ
भक्त आदि भवानी से अपनी लाज रखने की प्रार्थना करता है। साथ मिलकर यश गाने में सामूहिक भक्ति का भाव है।
पद 10 का अर्थ
अंत में स्मरण और शरणागति है। माँ के चरण आश्रय हैं। भावार्थ पद का आशय है, हर स्थानीय शब्द का शाब्दिक अनुवाद नहीं।
आरती गाते समय मुखड़ा और शब्दभेद
पहले मुखड़ा, फिर पद पढ़ें। “मैंया/मैया”, “करूं/करूँ” तथा “तोरी/तेरी/तुरी” जैसे लिखित रूप मिल सकते हैं। यहाँ “तोरी” मुख्य रूप है। खास गायन सीखना हो तो उसी रिकॉर्डिंग से उच्चारण मिलाएँ।
मंडली में पद के बाद मुखड़ा दोहराने की रीति हो तो वैसा करें। अस्पष्ट शब्दों को अनुमान से नहीं बदला गया है। दूसरा पाठ मिले तो स्रोत सहित मिलान करें।
परिवार या मंडली के साथ पाठ की तैयारी
समूह में एक व्यक्ति पद पढ़ सकता है और बाकी लोग अपनी परंपरा के अनुसार मुखड़ा दोहरा सकते हैं। गति ऐसी रखें कि बोल साफ सुनाई दें। फोन पर अक्षर बड़े कर लें। दीपक-कपूर की थाली स्थिर रखें और कपड़ों-पर्दों से दूर रखें। बच्चों को अग्नि की जिम्मेदारी न दें। किसी निश्चित संख्या में पाठ या महंगे सामान की बाध्यता यहाँ नहीं बताई गई है।
दुर्गे, काली और अम्बे नाम वाले आरती संस्करण
अपनी पसंद के देवी-नाम वाला पाठ चुनें। संबंधित संस्करण: दुर्गे वाली आरती · काली वाली आरती। संस्करण संबंधी नोट पढ़कर गायन के बोल मिलाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या यह किसी गायक के हूबहू बोल हैं?
नहीं। उपलब्ध दुर्गे वाले पाठ में मुखड़े का नाम अम्बे रखकर यह संस्करण तैयार किया गया है। खास गायन के लिए उसी रिकॉर्डिंग से मिलान करें।
“तुरी” या “तोरी” क्या लिखें?
अपने प्रचलित गायन का उच्चारण रखें। खोज के दोनों रूप बताए गए हैं; इस पेज में “तोरी” मुख्य रूप है।
क्या सभी शब्दों का अर्थ निश्चित है?
नहीं। कुछ स्थानीय शब्द अस्पष्ट हैं। उनकी जगह मनगढ़ंत अर्थ देने के बजाय सीमा स्पष्ट रखी गई है।
स्रोत और डिस्क्लेमर
आधार: उपलब्ध कराया गया पाठ और संबंधित दुर्गे संस्करण। देवी-नाम का अनुकूलन व भावार्थ संपादकीय हैं। धार्मिक कथाएँ और फल आस्था के विषय हैं। पाठभेद संभव हैं; निश्चित लाभ की गारंटी नहीं।