सनातन परंपरा में किसी भी बड़े महायज्ञ, शतचंडी अनुष्ठान, नवचंडी पाठ या तंत्र साधना में मंडलों की रचना बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इनमें चतुःषष्टि योगिनी मंडल (चौसठ योगिनी मंडल) का स्थान सर्वोपरि है। यह वेदी केवल एक ज्यामितीय आरेख नहीं है, बल्कि चौसठ दिव्य शक्तियों की ऊर्जा का जीवंत केंद्र मानी जाती है।
चौसठ योगिनी मंडल क्या है और इसका महत्व
योगिनियां मूलतः मां आद्यशक्ति भगवती दुर्गा की सहचर और अलौकिक शक्तियों का प्रतीक हैं। जब भी कोई वैदिक या पौराणिक अनुष्ठान प्रारंभ होता है, तो विघ्नों के नाश और अनुष्ठान की निर्विघ्न पूर्णता के लिए इस मंडल की विधिवत रचना की जाती है। वेदी पर कुमकुम, हल्दी, चावल और अबीर के रंगों से 64 खानों का त्रिकोणीय व वर्गाकार चक्र तैयार होता है, जिसमें 1 से लेकर 64 तक प्रत्येक योगिनी देवी का विशिष्ट स्थान नियत होता है।
मंडल निर्माण और पूजन के प्रमुख नियम
- दिशा का ध्यान: वेदी निर्माण सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके किया जाता है।
- कोष्ठक विभाजन: चार्ट के अनुसार 64 देवियों के कोष्ठक और ऊपर मुख्य त्रिकोण बनाए जाते हैं।
- आवाहन व स्थापन: प्रत्येक कोष्ठक में अक्षत और सुपारी रखकर संबंधित योगिनी के नाम मंत्र से उनका आवाहन किया जाता है।
- यज्ञीय पूर्णाहुति: अनुष्ठान की समाप्ति पर योगिनी बलि और आरती का विशेष विधान है।
कर्मकांड करने वाले आचार्यों और साधकों के लिए मंडल का सही क्रम समझना आवश्यक होता है। यहां प्रस्तुत चार्ट और पारंपरिक चित्र आपको वेदी रचना की सटीक दिशा, संख्या क्रम और देवियों के स्थान को समझने में स्पष्ट मार्गदर्शन देंगे।
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